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Nazm _Raqs kro_ Poet_Rashid Malik

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रक़्स करो दीवाना वारी रक़्स करो यू रक़्स करो के अंग अंग थिरके  थिरके शिरियानों में ख़ूं यूं रक़्स करो रक़्स करो कि झूमे जंगल ,बेलें, अंबर, धरती ,सारा आलम ऐसे रक़्स करो रक़्स करो कि ज़हन के दरवाजों से वहशत बिगडूट बाहर भागे ऐसे रक़्स करो रक़्स करो यूं कि जिस्म वक्त़ के क़ैद से बाहर हो जाए यूं रक़्स करो रक़्स करो यूं नूरी हैरत से थम जाए देखने वालों का ग़म जाए मन की कालक धुल जाए यू रक़्स करो रक़्स करो यूं सेहराओ में हरियाली हो जाए हर एक शक्ल निराली हो जाए यूं रक़्स करो रक़्स करो यूं बंजर आंखों में नम  आए ज़िंदा लाशों में दम आए ऐसे रक़्स करो रक़्स करो यूं  आंखों की बिनाई आए बहरे को आवाज़ बुलाए बहरा मारे शौक़ के गाए रक़्स करो दीवाना वारी रक़्स करो राशिद मलिक رقص کرو دیوانہ واری رقص کرو  یوں رقص کرو کہ انگ انگ تھرکے  تھرکے شریانوں میں خوں یوں رقص کرو رقص کرو کہ جھومیں جنگل ، بیلے ، امبر ، دھرتی،  سارا عالم ایسے رقص کرو  رقص کرو کہ ذہن کے دروازوں سے وحشت بگڈٹ باہر بھاگے ایسے رقص کرو  ‏رقص کرو یوں جسم وقت کے قید سے باہر ہو جائے یوں رقص کرو ...