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Ghazal_Poet_Farrukh Adeel

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मुस्कुराता था जहां कोई भंवर आता था तैरने का मुझे ऐसा भी हुनर आता था वक़्त ने धुंध सी भर दी है मेरे आंखों में पहले पहले तो बहुत साफ़ नज़र आता था नाम लेता था मैं उस शख्स का तारीकी  में और सूरज मेरे पहलू में उतर आता था आंख से होता हुआ जिस्म की बुनियाद तलक एक सैलाब था जो बारे दिगर आता था दर-बदर ख़ाक उड़ाते हुए फिरता हूं जहां इन्हीं रस्तों पे कभी मेरा भी घर आता था कोई करता था किनारे से इशारा मुझको  डूबते डूबते  मैं फिर से उभर आता था फ़र्रुख़ अदील غزل  مسکراتا تھا جہاں کوئی بھنور آتا تھا تیرنے کا مجھے ایسا بھی ہنر آتا تھا وقت نے دھند سی بھر دی ہے مری آنکھوں میں  پہلے پہلے تو بہت صاف نظر آتا تھا  نام لیتا تھا میں اُس شخص کا تاریکی میں اور سورج مرے پہلو میں اتر آتا تھا  آنکھ سے ہوتا ہوا جسم کی بنیاد تلک  ایک سیلاب تھا جو بارِ دگر آتا تھا  دربدر خاک اڑاتے ہوئے پھرتا ہوں جہاں  انہی رستوں پہ کبھی میرا بھی گھر آتا تھا کوئی کرتا تھا کنارے سے اشارہ مجھ کو  ڈوبتے ڈوبتے میں پھر سے ابھر آتا تھا فرخ عدیل

Ghazal_Poet_Badar Semab

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यह जनाब कोई पूछता नहीं जब वक्त़ हो ख़राब कोई पूछता नहीं अच्छे दिनों में साथ मेरे एक जहान था अब ज़िंदगी अज़ाब कोई पूछता नहीं खु़शियों का पूछते हैं सभी आकर बार-बार गम़ भी हैं दस्तयाब कोई पूछता नहीं अब क्या हुआ है मिस्र के सौदागरो  तुम्हें मैं बेचता हूं ख़्वाब कोई पूछता नहीं मुझ से एसीरे शब का ज़रा हाल देखना जुगनू कि माहताब कोई पूछता नहीं बदर सीमाब (कुवैत) دنیا ہے یہ جناب کوئی پوچھتا نہیں جب وقت ہو خراب کوئی پوچھتا نہیں اچھے دنوں میں ساتھ مرے اک جہان تھا اب زندگی عذاب ، کوئی پوچھتا نہیں خوشیوں کا پوچھتے ہیں سبھی آ کے بار بار غم بھی ہیں دستیاب کوئی پوچھتا نہیں اب کیا ہوا ہے مصر کے سوداگرو تمہیں ؟ میں بیچتا ہوں خواب کوئی پوچھتا نہیں مجھ سے اسیر شب کا ذرا حال دیکھنا جگنو کہ ماہتاب ، کوئی پوچھتا نہیں بدر سیماب۔۔۔۔ کویت