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Sher_Poet_Abdur Rehman Wasif

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उधेड़ दी है मेरी रूह तक इसी ग़म ने तुझे बिछड़ के मेरी याद तक नहीं आई अब्दुर रहमान वासिफ़ اُدھیڑ دی ہے مِری رُوح تک اِسی غم نے      تُجھے بچھڑ کے مِری یاد تَک نہیں آئی         ۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔                      عَبدَالرَّحمٰن وَاصِف

Sher_Poet_Hasan Zaidi

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बिछड़ के तुझसे कभी फिर नहीं कहा हमने  हमारे पास खुदा का दिया बहुत कुछ हसन जै़दी بچھڑ کے تجھ سے کبھی پھر نہیں کہا ہم نے ہمارے پاس خدا کا دیا بہت کچھ ہے حسن زیدی

Ghazal_ Poet _ Zamir Qais

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कुछ इसलिए भी थकन की दलील चुभती है ज़रा जो टेक लगाऊं फ़सील चुभती है नहा रहा हूं उदासी के बर्फजा़रों में बदन को धूप नहीं अब तो झील चुभती है चराग़ ख़ल्क़ हुआ था मेरे घराने में हवा को इसलिए मेरी क़बील चुभती है मिजा़ज व लम्स में ऐसा तज़ाद है कि मैं गुदाज़ लगता है ख़ंजर शनील चुभती है यह दिल है तिष्णा खज़ा़नों का वह सुराग़ जैसे मताए ख़सलते  दरिया ए नील चुभती है मैं चश्मे जख्मे  फिलीस्तीन की बसारत हूं मुझे भी रेगे बनी इसराइल चुभती है तवज्जो यार की खै़रात खास है जो सदा बढ़े तो बद गुमान करदे कलील चुभती है मैं चुन रहा हूं मुसाफ़त की कृचियां जब से हर एक सतरे ख़ते संगे मील चुभती है अब ऐसे मख़मली पैरों को कौन सहलाए ज़मीं पे रखते हुए जिनको बेल चुभती है यह  हिॼ भी है आजी़यत में जिंदगी करना कि जिस तरह किसी जूते कील  चुभती है दिखाए कोई तो नींदों के ख़्वाब मुझको ज़मीर सितारे गिनते हुए शब  तवील चुभती है ज़मीर कै़स کچھ اس لئے بھی تھکن کی دلیل چبھتی ہے ذرا جو ٹیک لگاؤں ، فصیل چبھتی ہے نہا رہا ہوں اداسی کے برف زاروں میں بدن کو دھوپ نہیں اب تو جھیل چبھتی ہے چراغ خلق ہوا تھا مرے گھرانے ...

Sher _Poet _Asif Mahmood Kaifi

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   तुम्हारा नाम भी आएगा उसके होठों पर  सदाएं लौट के आती है इंतजा़र करो आसिफ़ महमूद कैफ़ी تمہارا نام بھی آئے گا اس کے ہونٹوں پر صدائیں لوٹ کے آتی ہیں انتظار کرو ۔ آصف محمود کیفی

Ghazal _Poet Syed Ali shahrukh

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चमन मिले भी तो सेहरा शुमार होते हैं यह हादसात यहां बार-बार होते हैं यह आरजूं है उन बस्तियों में जा निकलूं कि अहले जर्फ़ जहां बेशुमार होते हैं वह जितनी देर में कश्ती क़रीब लाते  हैं हम इतनी देर में दरिया के पार होते हैं हमारे साथ मोहब्बत न कर दिलासा दे हम ऐसे लोग ग़रीबे दयार होते हैं विसाल व हिज़्र  को यकजा करेंगे हम कैसे यह दो किनारे कहां हम कनार होते हैं ना आप हौसला देते हैं रोने वालों को ना आप शामिले चीख़ो पुकार  होते हैं अजीब रंगे वफा है हमारी महफ़िल में हमारे यार ज़माने के यार होते हैं हम अपने दर्द तो तहरीर कर नहीं सकते तुम्हारे जि़क्र पर बस शर्मसार होते हैं सैयद अली शाहरुख چمن ملیں بھی تو صحرا شمار ہوتے ہیں یہ حادثات یہاں بار بار ہوتے ہیں  یہ آرزو ہے کہ ان بستیوں میں جا نکلوں  کہ اہل ظرف جہاں بے شمار ہوتے ہیں  وہ جتنی دیر میں کشتی قریب لاتے ہیں  ہم اتنی دیر میں دریا کے پار ہوتے ہیں  ہمارے ساتھ محبت نہ کر دلاسہ دے ہم ایسے لوگ غریب دیار ہوتے ہیں  وصال و ہجر کو یکجا کریں گے ہم کیسے یہ دو کنارے کہاں ہم کنار ہوتے ہیں  نہ آپ ح...

Ghazal. _ Poet _Komal Joya

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  नए सफ़र के इरादे से जब मैं जा रही थी मैं पूछ थोड़ी रही थी बता रही थी कमाल ए हब्स में दोनों की ख़ूब जमने लगी मेरे चिराग़ की मुर्शिद कभी हवा रही थी सभी सराह रहे थे ये खुशमिज़ाजी मगर मेरे मज़ाक का वहशत बुरा मना रही थी यह सब्ज़गी नहीं यह चोट थी दरख़्तो की जो शाख़े ज़र्द  की वीरानियो   को खा रही थी  सुख़न की पहली तिलावत पर सब सकूत में थे मै नेकियों की तरह नाम भी कमा रही थी और अब यह तर्क ए ताल्लुक भी क्यों छुपाऊं कि मैं अगर तुम्हारी रही थी तो बरमला रही थी अब इस गुनाह का कफ्फारा हो अदा कैसे मैं मुस्कुरा के उदासी का दिल दुखा रही थी कोमल जोया نئے سفر کے ارادے سے جب  میں جارہی تھی میں پوچھ تھوڑی رہی تھی اسے بتا رہی تھی کمالِ حبس میں دونوں کی خوب جمنے لگی مرے چراغ کی مرشد کبھی ہوا رہی تھی سبھی سراہ رہے تھے یہ خوش مزاجی مگر مرے مذاق کا وحشت برا منا رہی تھی یہ سبزگی نہیں یہ چوٹ تھی درختوں کی جو شاخِ زرد کی ویرانیوں کو کھا رہی تھی سخن کی پہلی تلاوت پہ سب سکوت میں تھے میں نیکیوں کی طرح نام بھی کما رہی تھی اور اب یہ ترکِ تعلق بھی کیوں چھپاؤں کہ می...