कुछ इसलिए भी थकन की दलील चुभती है ज़रा जो टेक लगाऊं फ़सील चुभती है नहा रहा हूं उदासी के बर्फजा़रों में बदन को धूप नहीं अब तो झील चुभती है चराग़ ख़ल्क़ हुआ था मेरे घराने में हवा को इसलिए मेरी क़बील चुभती है मिजा़ज व लम्स में ऐसा तज़ाद है कि मैं गुदाज़ लगता है ख़ंजर शनील चुभती है यह दिल है तिष्णा खज़ा़नों का वह सुराग़ जैसे मताए ख़सलते दरिया ए नील चुभती है मैं चश्मे जख्मे फिलीस्तीन की बसारत हूं मुझे भी रेगे बनी इसराइल चुभती है तवज्जो यार की खै़रात खास है जो सदा बढ़े तो बद गुमान करदे कलील चुभती है मैं चुन रहा हूं मुसाफ़त की कृचियां जब से हर एक सतरे ख़ते संगे मील चुभती है अब ऐसे मख़मली पैरों को कौन सहलाए ज़मीं पे रखते हुए जिनको बेल चुभती है यह हिॼ भी है आजी़यत में जिंदगी करना कि जिस तरह किसी जूते कील चुभती है दिखाए कोई तो नींदों के ख़्वाब मुझको ज़मीर सितारे गिनते हुए शब तवील चुभती है ज़मीर कै़स کچھ اس لئے بھی تھکن کی دلیل چبھتی ہے ذرا جو ٹیک لگاؤں ، فصیل چبھتی ہے نہا رہا ہوں اداسی کے برف زاروں میں بدن کو دھوپ نہیں اب تو جھیل چبھتی ہے چراغ خلق ہوا تھا مرے گھرانے ...