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Showing posts with the label Poetry 2021

Ghazal_Poet_Gul Jahan

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कहानी हिज्र की शायद सुनी है पहाड़ों पर उदासी उग पड़ी है मुझे मंजि़ल की जानिब खींचती है चमकती रेत में जो रोशनी है दरख़्तों में नहीं फ़िरक़ा परस्ती  ख़िजां में जिसको देखो मातमी है अकेला हूं मैं और इतना अकेला मेरी खुद से भी कब हमसाएगी है मुसव्विर हूं मैं तेरी खामशी का तुझे आवाज़ मेरी देखनी है मैं शिद्दत में ओसूली आदमी हूं सो अब तर्के मोहब्बत दायमी है गुल जहान کہانی ہجر کی شاید سنی ہے پہاڑوں پر اداسی اُگ پڑی ہے مجھے منزل کی جانب کھینچتی ہے چمکتی ریت میں جو روشنی ہے درختوں میں نہیں فرقہ پرستی خزاں میں جس کو دیکھو ماتمی ہے اکیلا ہوں میں اور اتنا اکیلا مری خود سے بھی کب ہمسایگی ہے ؟ مصور ہوں میں تیری خامشی کا تجھے آواز میری دیکھنی ہے !! میں شدت میں اصولی آدمی ہوں سو اب ترکِ محبت دائمی ہے  گل جہان

Ghazal_ Poet_ Shahla Khan

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कहीं जवाब कहीं पर दलील झूठी है  मगर हमारी वजा़हत फ़क़त खमोशी है हज़ारों मील की दूरी है दरम्यान मगर कहीं कहीं यह ज़मीं आसमां से मिलती है हव की सिम्त पे इल्ज़ाम रख दिया वरना महक की राह में हायल वह खिड़की है पुकार बर्फ़ के अंदर हनुत हो भी चुकी मगर वह गूंज अभी पर्वतों में बाकी है किसी की अर्जि़यां सुनने से क्या ग़र्ज़ तुमको यह बेनयाज़ी तेरी पत्थरों के जैसी है मजाल है कि कभी छोड़ दे अकेला हमें हमारे साथ हमारी उदासी रहती है मैं मरने लगती हूं लेकिन तेरी सदा फिर से  रुकी रुकी मेरी धड़कन बहाल करती है शहला ख़ान کہیں جواب کہیں پر دلیل جھوٹی ہے مگر ہماری وضاحت فقط خموشی ہے ہزاروں میل کی دوری ہے درمیان مگر کہیں کہیں یہ زمیں آسماں سے ملتی ہے ہوا کی سمت پہ الزام رکھ دیا ورنہ مہک کی راہ میں حائل وہ ایک کھڑکی ہے پکار برف کے اندر حنوط ہو بھی چکی مگر وہ گونج ابھی پربتوں میں باقی ہے کسی کی عرضیاں سننے سے کیا غرض تجھکو یہ بے نیازی تری پتھروں کے جیسی ہے مجال ہے کہ کبھی چھوڑ دے اکیلا ہمیں ہمارے ساتھ ہماری اداسی رہتی ہے میں مرنے لگتی ہوں لیکن تری صدا پھر سے رکی رکی مری دھڑکن بحا...

Sher_Ata_Ur_Rehman Qazi

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पुकारता है ज़मानों की दूरियों से कोई गई रूतों की उड़ाने परों में रख लेना अताउर रहमान क़ाज़ी پکارتا ہے زمانوں کی دوریوں سے کوئی گئی رتوں کی اڑانیں پروں میں رکھ لینا عطاءالرحمن قاضی

Ghazal_Poet Faqeeh Haider

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"غزل " ڈوبتے وقت سفینے کی طرف آتے ہیں  لوگ مرتے ہوئے جینے کی طرف آتے ہیں  اشک بہنے کی اجازت نہیں لیتے مجھ سے  جب محرم کے مہینے کی طرف آتے ہیں  جس طرح آتا ہے لشکر کوئی لشکر کی طرف  زخم ایسے مرے سینے کی طرف آتے ہیں  اہل ِ یثرب سے کہو گریہ کریں نوحے پڑھیں  کربلا والے مدینے کی طرف آتے ہیں  کم ہی لمحات تری یاد کے دیتے ہیں سکون  بیشتر خون ہی پینے کی طرف آتے ہیں کچھ ریا کار ہیں ایسے بھی مرے شہر میں جو بڑی تہذیب سے کینے کی طرف آتے ہیں  لوگ آتے ہیں مرے زخم پرکھنے کے لیے  جوہری جیسے نگینے کی طرف آتے ہیں  جب دہکتا ہے حیاؤں کی تپش سے وہ بدن  تتلیاں جگنو پسینے کی طرف آتے ہیں  فقیہ حیدر डूबते वक्त सफ़ीने की तरफ आते हैं लोग मरते हुए जीने की तरफ आते हैं अश्क बहने की इजाज़त नहीं लेते मुझसे जब मोहर्रम के महीने की तरफ़ आते हैं जिस तरह आता है लश्कर कोई लश्कर की तरफ़ ज़ख़्म ऐसे मेरे सीने में आते हैं अहले यसरब से कहो गिरिया करें नोहे पढ़ें कर्बला वाले मदीने की तरफ़ आते हैं कम ही लम्हात तेरी याद के देते हैं सकूं बेशतर ख़ून ही ...

Sher_Poet_ Ubaid Saqib

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जब वह नहीं रहा तो बहारें नहीं रहीं सुखे रहे शजर तो परिंदे भी उड़ गए उबैद साकिब جب وہ نہیں رہا تو بہاریں نہیں رہیں سوکھے رہے شجر تو پرندے بھی اڑ گئے عبید ثاقب

Ghazal_Poet _Zulfiqar Zaki

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हिसाब ए दिल में जो उल्फ़त के गोशवारे हैं क़सम ख़ुदा की वह जितने भी हैं तुम्हारे हैं है और बात कि हम ग़ौर ही नहीं करते वगरना विस्ल में भी हिज्र के इशारे है कई बरस कई सदियां असीर हैं इन में यह चंद पल जो तेरी याद में गुजा़रे हैं कि जैसे से उलझी हुई डोरियां संवर जाऐं किसी दुआ ने मेरे बख्त़  यूं संवारे हैं हवा के दोश पे राकिब ،ग़ुसैल मौजों का वह तनतना है के  सहमे हुए किनारे हैं ख़मोश बैठ के तकता हूं रोज़ हैरत से दरूने जा़त भी क्या-क्या हसीं नज़ारे हैं मेरे कलाम का उनुवान बस मोहब्बत है हर एक शेर में चाहत के इस्तेआरे रहे हैं कोई दुआ या कोई विर्द हो ज़की जैसे शबे फ़िराक़ ,मैंने अश्क यूं शुमारे हैं ज़ुल्फ़िका़र ज़की حسابِ دل میں جو الفت کے گوشوارے ہیں قسم خدا کی وہ جتنے بھی ہیں تمھارے ہیں ہے اور بات کہ ہم غور ہی نہیں کرتے وگرنہ وصل میں بھی ہجر کے اشارے ہیں کئی برس ،، کئی صدیاں اسیر ہیں ان میں یہ چند پل جو تری یاد میں گزارے ہیں کہ جیسے الجھی ہوئی ڈوریاں سنور جائیں کسی دعا نے مرے بخت یوں سنوارے ہیں ہوا کے دوش پہ راکب ، غصیل موجوں کا وہ طنطنہ ہے کہ سہمے ہوئے کنارے ہیں خموش بیٹ...

Ghazal_Poet_Syed ‎Javed Bukhari

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तमाम आग तखै़युल  में भर के ला रहा था  मैं एक दर्द से सुबकदोष होके आ रहा था क़दीम याद  अजब दर्द लेके आई थी पुराना जख़्म नई शोलगी  दिखा रहा था इसी लिए तो मेरा चेहरा गर्द गर्द हुआ  मैं आईने की नज़र में गु़बार ला रहा था आंख बुझते हुए भी बुझा रही थी यह प्यास हाथ जलते हुए भी दीया जला रहा था यहअब ग़ज़ल में दर आए हैं और भी पहलू गए दिनों में मोहब्बत ही का़फि़या रहा था  वह ख़ुद को चाक पे लाया था लेकिन उससे अलग वह अपनी ख़ाक से रोशन दिया बना रहा था धुआं धुआं सी मोहब्बत कहां गई जावेद उससे बुझती हुई रोशनी कमा रहा था सय्यद जावेद تمام آگ تخیل میں بھر کے لا رہا تھا میں ایک در سے سبک دوش ہوکے آرہا تھا قدیم یاد عجب درد لے کے آئی تھی پرانا زخم نئی شعلگی دکھا رہا تھا اسی لئیے تو مرا چہرہ گرد گرد ہوا میں آئینے کی نظر میں غبار لا رہا تھا وہ آنکھ بجھتے ہوئے بھی بجھا رہی تھی یہ پیاس وہ ہاتھ جلتے ہوئے بھی دیا جلا رہا تھا یہ اب غزل میں در آئے ہیں اور بھی پہلو گئے دنوں میں محبت ہی قافیہ رہا تھا وہ خود کو چاک پہ لایا تھا لیکن اس سے الگ وہ اپنی خاک سے روشن دیا بن...