Nazm _Saheli_ Poet Rashid Imam
Nazm -Saheli -Poet-Rashid Imam सहेली सहेली ख़ुदा की पहेली कहानी सुनो गी हमारी कहानी तुम्हें याद है जब मैं मिट्टी का बुत था और हम एक नफ़स़ थे तुम्हें याद होगा वह रूहो का मेला जहां हम मिले थे वहां से निकलकर जमीं नाम के एक जज़ीरे पे हूं हां मगर तुम कहीं जा चुकी हो कहां हो इधर में ज़मीं पर नए जा़यचे खींचकर तुम्हें ढूंढने चल पड़ा हूं कोलंबस के नक्शे पिकाचू के हाथों से पेंटिंग किए मार्कोपोलो जैसे सफर ज़ाद लोगों को साथी किया तूर ए सीना की चोटी से उतरा कहीं मिस्र और शहरे बाबल से होता हुआ अहले फारस के दरबारियों तक गया मैं मुअर्रिख़ के पन्ने भटकता फिरा और जंगो के मंज़र से सीना भरा मै क़दीमी ज़मानो से अब तक फीरा हूं मगर तुम कहां हो सहेली खुदा की पहेली समुंदर के परले कई एक परिस्तां बड़े देवताओं के मसनद लगे वह इलाके़ दरख़्तों के पत्ते अनाजों की फ़सलें सभी कारखा़ने ज़माने की सड़कें जहाज़ों के रस्ते सभी छान मारे मैं क़रनों के सीने पे चलता हुआ तुझ तलक आ गया हूं तो पिटबुल (pit bull) के गीतों से बाहर मिलो अच्छे केफ़े के शीशे की न ने के अंधेरे से हटकर किसी रोशनी ...