Ghazal_Poet_Faqeeh Haider
दिल उजड़ जाए मेरी आंख भी वीरान ना हो कैसे मुमकिन है जुनूं में कोई नुकसान ना हो उंगलियां हम पे उठाते हैं वही सारे लोग जिनका अपना कोई शजरा कोई पहचान ना हो इतनी वीरानी कभी पहले नहीं देखी थी कोई तो मुझसे कहे यार परेशान ना हो ख़ून देते हुए गुज़री है मेरी सारी उम्र जिंदगी कहता हूं मैं जिसको बलिदान ना हो ऐसे लोगों पे तरस आता है मुझको जिनका आंख होते हुए भी ख़्वाब पे ईमान ना हो फूल लाया है कोई मेरे लिए ठीक मगर जिसको गुलदान समझता हूं नमकदान ना हो किसी मुश्किल से गुजऱने की मुझे ख़्वाहिश है ऐसी मुश्किल जो किसी तौर में आसाम ना हो दशत में घूमता हूं, नाचता हूं, सोचता हूं दशत भी मेरे मकां का कहीं दालान ना हो ऐसे लोगों में मेरी शायरी की क्या औका़त मो'तबर जिनके लिए मीर का दीवान ना हो उस उदासी पे अजीयत पे पड़े खा़क फ़कीह नम अगर आंख मेरी हिज्र के दौरान ना हो फ़की़ह हैदर ،، غزل ،، دل اُجڑ جائے مری آنکھ بھی ویران نہ ہو کیسے ممکن ہے جنوں میں کوئی نقصان نہ ہو ؟ انگلیاں ہم پہ اٹھاتے ہیں وہی سارے لوگ جن کا اپنا کوئی شجرہ کوئی پہچان نہ ہو اتنی ...