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Ghazal_Poet_Maouvez Hasan

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उदासी चिड़चिड़ापन रतजगा है कोई आसेब‌ मुझ में पल रहा है जहां की‌ इरतकाई साजि़शों में जमीं एक मो'जजा़ती हादसा है मेरे अंदर का आवारा मुसाफ़िर ख़्यालों की ट्रैफ़िक में फंसा है ख़सारों पर भी खुल कर हंस रहे हैं हमारा कर्ब बूढ़ा हो गया है कई हफ़्तों से सरवत पढ़ रहा था और अब दिल पटरियों पर चल रहा है मुसव्विर ने मेरा चेहरा बनाकर ख़सारा कैनवस पर धर दिया है तुम्हारी ओर देखा, और देखा नदी का रंग पीला पड़ गया है मैं उसके वसवसों में आ गया हूं वह जिससे टेलिफो़निक राब्ता है घड़ी की सुइयां उल्टी घुमाकर मुक़द्दर हम को थप्पड़ मारता है मोहब्बत की लड़ाई में मु'अव्विज़ तकल्लुफ़ इबतदाई सानेहा है मु'अव्विज़ हसन اداسی چڑچڑاپن رتجگا ہے  کوئی آسیب مجھ میں پل رہا ہے  جہاں کی ارتقائی سازشوں میں  زمیں اک معجزاتی حادثہ ہے  مرے اندر کا آوارہ مسافر  خیالوں کی ٹریفک میں پھنسا ہے خساروں پر بھی کھل کر ہنس رہے ہیں ہمارا کرب بوڑھا ہو گیا ہے   کئی ہفتوں سے ثروت پڑھ رہا تھا اور اب دل پٹریوں پر چل رہا ہے  مصور نے مرا چہرہ بنا کر  خسارہ کینوس پر دھر دیا ہے تمہاری اور دیکھا، اور دیکھ...

Ghazal_, Poet_Faqeeh Haider

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कूफ़ियो जैसे मोमनीन के नाम यह गज़ल है मुनाफ़िकी़न के नाम एक नारा खि़रद की हालत में दिन-ब-दिन बढ़ते जाहिलीन के नाम ख़ाक के साथ हो गया हूं ख़ाक और मैं क्या करूं ज़मीन के नाम यह मेरा आख़री तमाशा है सब की सब दाद शायकी़न के नाम रोज़ लिखता हूं पानियों पर मैं कर्बला तेरे जा़यरीन के नाम एक तवायफ़ के जिस्म पर लिखे हैं शहर के सारे सालेहीन के नाम फ़कीह ‌हैदर کوفیوں جیسے مومنین کے نام  یہ غزل ہے منافقین کے نام  ایک نعرہ خرد کی حالت میں  دن بہ دن بڑھتے جاہلین کے نام  خاک کے ساتھ ہو گیا ہوں خاک  اور میں کیا کروں زمین کے نام یہ مرا آخری تماشاہے  سب کی سب داد شائقین کے نام   روز لکھتا ہوں پانیوں پر میں  کربلا تیرے زائرین کے نام  اک طوائف کے جسم پر لکھے ہیں  شہر کے سارے صالحین کے نام  فقیہ حیدر

Sheir_Poet_yusuf Khalid

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محبت کے ہزاروں رنگ ہیں اک رنگ یہ بھی ہے کسی کو سوچنا محسوس کرنا اور چپ رہنا یوسف خالد मुहब्बत के हज़ारों रंग हैं इक रंग ये भी है किसी को सोचना महसूस करना और चुप रहना यूसुफ खालिद

Ash'aar_Poet_Shahzad Nayyar

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سایہء درد جو نکلا مرے قد سے بڑھ کر میں نے بے درد کو چاہا بھی تو حد سے بڑھ کر साया_ए_दर्द जो निकला मेरे क़द से बढ़ कर मैंने बेदर्द को चाहा भी तो हद से बढ़ कर واعظو ! خواہشِ زر بھی تو شرارِ شر ہے دل کو یہ آگ جلاتی ہے حسد سے بڑھ کر वाइज़ो । ख़्वाहिश_ए_जर भी तो शरारे शर है दिल को ये आग जलाती है हसद से बढ़ कर دشتِ لیلٰی کا مسافر ہے تو اِتنا سُن لے  اپنی آنکھوں میں جُنُوں باندھ، خِرد سے بڑھ کر दश्त_ए_लैला का मुसाफ़िर है तो इतना सुन ले अपनी आंखों में जूनूं बांध ख़िरद से बढ़ कर शहजाद नय्यर

Ghazal_Poet_Faqeeh Haider

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،،غزل ،، چراغ نیند کی محراب تک نہیں آیا  قسم ہے آنکھ میں اک خواب تک نہیں آیا चराग़ नींद की मेहराब तक नहीं आया  क़सम है आँख मे एक ख़्वाब तक नहीं आया  سبھی نے شوق ِ شہادت میں سر کٹا دئیے ہیں کوئی بھی جنگ کے اسباب تک نہیں آیا सभी ने शौक़_ए_शहादत मे सर कटा दिए हैँ  कोई भी जंग के असबाब तक नहीं आया ہمارے عشق سے کیسے ملے جنوں کو فروغ  ہمارا عشق تب و تاب تک نہیں آیا हमारे इश्क़ से कैसे मिले जनूं को फ़रोग़  हमारा इश्क़ तब_ओ_ताब तक नहीं आया  ابھی مشیت ِ خالق نہیں پڑھی تونے ؟ ابھی تو سورہ ء احزاب تک نہیں آیا अभी मशीयत_ए_ख़ालिक़ नहीं पढ़ी तु ने  अभी तु सुरह_ए_अहज़ाब तक नहीं आया وہ رنگ زنگ ہوا یا بنا دھواں آخر  جو رنگ اس لب ِ نایاب تک نہیں آیا वह रंग रंग हुआ या बना धुआँ आख़िर  जो रंग उस लब_ए_नायब तक नहीं आया بھرے ہیں مشکوں میں مشکیزگاں نے دریا تک  ہمارے ہاتھ میں تالاب تک نہیں آیا भरे हैँ मुश्कों मे मुश्केजगाँ ने दरया तक  हमारे हाथ मे तालाब तक नहीं आया ندی چڑھی ہے کئی بار میری آنکھوں کی  مگر یہ سلسلہ سیلاب تک نہیں آیا नदी चढ़ी है कई बार मेरी आँखों...

Ghazal_Poet_Ahmed Imtiaz

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जवाब एक सा है और सवाल एक सा है ये क्या हुआ है कि दोनो का हाल एक सा है  बुलंदियों का वहां है तो पस्तियों का यहां है  बस आसमा_ओ_ज़मीं का कमाल एक सा है हर एक शख्स का अंजाम रायगानी है ये ज़िंदगी है तो सब पे वबाल एक सा है जुदाई  आंख में आंसू हैं मिलना खंदा ब लब फ़िराक एक सा सबका विसाल एक सा है कोई भी साअत खुश रंग आज तक न मिली हमारे वास्ते हर एक साल एक सा है  अहमद इम्तियाज جواب ایک سا ہے اور سوال ایک سا ہے یہ کیا ہوا ہے کہ دونوں کا حال ایک سا ہے بلندیوں کا وہاں ہے تو پستیوں کا  یہاں  بس آسمان و زمیں کا کمال ایک سا ہے ہر ایک شخص کا انجام رائیگانی ہے یہ زندگی ہے تو سب پہ وبال ایک سا ہے جدائی آنکھ میں آنسو ہیں ملنا خندہ بہ لب فراق ایک سا سب کا وصال ایک سا ہے کوئی بھی ساعت خوش رنگ آج تک نہ ملی ہمارے واسطے ہر ایک سال ایک سا ہے احمد امتیاز

Sher_Poet_Suhail Rai

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ہم کسی آنکھ کے شہر میں قید ہیں  زندگی نیند ہے آدمی خواب ہیں سہیل رائے हम किसी आंख के शहर में क़ैद हैं ज़िंदगी नींद है आदमी ख़्वाब है सोहैल राय

Sher_Poet_Naeem Ahmad Naeem

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Ghazal_Poet_Faqeeh Haider

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दिल उजड़ जाए मेरी आंख भी वीरान ना हो कैसे मुमकिन है जुनूं में कोई नुकसान ना हो उंगलियां हम पे उठाते हैं वही सारे लोग जिनका अपना कोई शजरा कोई पहचान ना हो इतनी वीरानी कभी पहले नहीं देखी थी कोई तो मुझसे कहे यार परेशान ना हो ख़ून देते हुए गुज़री है मेरी सारी उम्र जिंदगी कहता हूं मैं जिसको बलिदान ना हो ऐसे लोगों पे तरस आता है मुझको जिनका आंख होते हुए भी ख़्वाब पे ईमान ना हो फूल लाया है कोई मेरे लिए ठीक मगर जिसको गुलदान समझता हूं नमकदान ना हो किसी मुश्किल से गुजऱने की मुझे ख़्वाहिश है  ऐसी मुश्किल जो किसी तौर में आसाम ना हो दशत में घूमता हूं, नाचता हूं, सोचता हूं दशत भी मेरे मकां का कहीं दालान ना हो ऐसे लोगों में मेरी शायरी की क्या औका़त मो'तबर जिनके लिए मीर का दीवान ना हो उस उदासी पे अजीयत पे पड़े खा़क फ़कीह नम अगर आंख मेरी हिज्र के दौरान ना हो फ़की़ह हैदर ،، غزل ،، دل اُجڑ جائے مری آنکھ بھی ویران نہ ہو   کیسے ممکن ہے جنوں میں کوئی نقصان نہ ہو ؟ انگلیاں ہم پہ اٹھاتے ہیں وہی سارے لوگ    جن کا اپنا کوئی شجرہ کوئی پہچان نہ ہو اتنی ...