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Ghazal_Poet_Tanveer Qazi

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غزل ۔۔۔۔۔۔۔۔۔ سمندر سے جو میری گُفتگُو تھی اُسے مچھلی بھی سُن کر سُرخ رُو تھی کہیں جاری تھی پیوند کاریِ دل وہ نیلی آنکھ مائل بہ رفُو تھی ہمیں موسم مقیّد کر چکا تھا صدائے آئینہ بھی خُوش گُلو تھی ہرن پہلو بچاتے ہف گئے تھے ہماری خاک اُڑتی کُو بہ کُو تھی لگے وہ اُون کا بیوپار کرنے کوئی ایسی چراگاہوں میں بُو تھی کوئی لمحہ گِھرا تھا پانیوں میں کوئی حیرت کنارِ آب جُو تھی سبھی موزیل کی پوشاک میں تھے چہار اطراف اک منٹو کی بُو تھی مسافر کشتیوں میں اونگھتے تھے کسی قزاق کی آنکھوں میں لُو تھی کبھی آتے شجر پینگیں جُھلاتے کُھدے ناموں کے بھیتر آرزو تھی ابھی کچھ بھید عُریاں ہو رہے تھے ابھی کچھ کائی کے نیچے نمُو تھی tanveerqaazzii समुंदर से जो मेरी गुफ़्तगु थी उसे मछली भी सुन कर सुर्ख़ रू थी कहीं जारी थी पेवंद कारी_ए_दिल वह नीली आंख मायल ब रफ़ू थी हमें मौसम मुक़य्यद कर चुका था सदा_ए_आईना भी ख़श गुलू‌ थी हरण पहलू बचाते हफ़ गए थे हमारी खा़क उड़ती कू ब कू थी लगे वह ऊन का व्यापार करने कोई ऐसी चरागाहों ‌ में हू‌ थी कोई लम्हा घिरा था पानियों में कोई हैरत किनारे आब जू थी स...

Ghazal_, Poet_Faqeeh Haider

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कूफ़ियो जैसे मोमनीन के नाम यह गज़ल है मुनाफ़िकी़न के नाम एक नारा खि़रद की हालत में दिन-ब-दिन बढ़ते जाहिलीन के नाम ख़ाक के साथ हो गया हूं ख़ाक और मैं क्या करूं ज़मीन के नाम यह मेरा आख़री तमाशा है सब की सब दाद शायकी़न के नाम रोज़ लिखता हूं पानियों पर मैं कर्बला तेरे जा़यरीन के नाम एक तवायफ़ के जिस्म पर लिखे हैं शहर के सारे सालेहीन के नाम फ़कीह ‌हैदर کوفیوں جیسے مومنین کے نام  یہ غزل ہے منافقین کے نام  ایک نعرہ خرد کی حالت میں  دن بہ دن بڑھتے جاہلین کے نام  خاک کے ساتھ ہو گیا ہوں خاک  اور میں کیا کروں زمین کے نام یہ مرا آخری تماشاہے  سب کی سب داد شائقین کے نام   روز لکھتا ہوں پانیوں پر میں  کربلا تیرے زائرین کے نام  اک طوائف کے جسم پر لکھے ہیں  شہر کے سارے صالحین کے نام  فقیہ حیدر

Sheir_Poet_Rahat Sarhadi

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فریب کھایا ہے ایسا کہ زہر لگتی ہے  مجھے تو لوگوں کے چہروں پہ مسکراہٹ تک  راحتؔ سرحدی फ़रेब खाया है ऐसा कि ज़हर लगती है मुझे तो लोगों के चेहरे पे मुस्कुराहाट तक राहत सरहदी

Sheir_Poet_yusuf Khalid

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محبت کے ہزاروں رنگ ہیں اک رنگ یہ بھی ہے کسی کو سوچنا محسوس کرنا اور چپ رہنا یوسف خالد मुहब्बत के हज़ारों रंग हैं इक रंग ये भी है किसी को सोचना महसूस करना और चुप रहना यूसुफ खालिद

Sher_Ata Qazi Ata

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मै अपनी ज़ात से निकला तो यूं हुआ कि अता कुछ और फैल गया गम शश भी जिहात में अताउर रहमान क़ाज़ी میں اپنی ذات سے نکلا تو یوں ہوا کہ عطا کچھ اور پھیل گیا غم بھی شش جہات کے ساتھ عطاءالرحمن قاضی

Nazm(Kavita)_Mohabbat Gahri Hojae_Poet_yusuf Khalid

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मुहब्बत गहरी होजाए तो अपना रुख़ बदलती है तसलसुल तोड़ती है गुफ़्तगू पे चुप की चादर डाल देती है यूसुफ़ खालिद محبت گہری ہو جائے تو اپنا رخ بدلتی ہے تسلسل توڑتی ہے  گفتگو پہ چپ کی چادر ڈال دیتی ہے یوسف خالد

Sher_Poet_Amaanullah Khan Amaan

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इक रिदा_ए_खाम्शी ओढ़ी है सारे शहर ने हर बदन ज़ख्मी है लेकिन बोलता कोई नही AmaanUllah Khan Amaan اک ردائے خامشی اوڑھی ھے سارے شہر نے  ہر بدن زخمی ہے لیکن بولتا کوئی نہیں ۔ امان اللہ خان امانؔ

Ghazal_Poet_Abdur Rehman Wasif

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غزل آپ کے درد گزیدوں کی زباں کھولتے ہیں لفظ قرطاس پہ جب دل کا دُھواں کھولتے ہیں  بڑھتی جاتی ہے تعفّن کی ہلاکت خیزی  زخم اپنے جو کبھی تشنہ لباں کھولتے ہیں منتظر شخص یہ بہتر ہے مزید آس نہ رکھ  دل کا دروازہ وہ ہر اک پہ کہاں کھولتے ہیں  آپ ترکش میں رَکھے تِیر برابر کر لیں ہم عزا خانہِ وَحشت زَدَگاں کھولتے ہیں  لب پہ لاتے ہیں وہ بس ایک تبسم کی رمق اور ہمکتے ہوئے دل رختِ گماں کھولتے ہیں آئیے ! آپ کو ملواتے ہیں بیداری سے  آئیے ! آپ پہ ترتیبِ زماں کھولتے ہیں ۔۔۔۔۔۔۔ عبدالرحمان واصف आप के दर्द गजी़दों की जु़बान खोलते हैं लफ्ज़ कि़रतास पर जब दिल का धुंआ खोलते हैं बढ़ती जाती है त'अफ़्फ़ुन की हिलाकत खैजी  ज़ख्म अपने जो कभी तिश्ना-लबां खोलते हैं मुंतज़िर शख्स ये बेहतर है मजी़द आस न रख दिल का दरवाज़ा वह हर एक पर कहां खोलते हैं आप तरकश में रखे तीर बराबर कर लें हम अज़ा ख़ान_ए_ वहशत ज़दगां खोलते हैं लब पे लाते हैं वह बस एक तबस्सुम की रमक़ और हमकते हुए दिल रख़त_ए_ गुमां खोलते हैं आइए आपको मिलवाते हैं बेदारी से आइए आप पे ये तरतीबे ज़मा खोलते हैं...

Ghazal_Poet_Aaila Tahir

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क़ुर्बतों के नशे याद आने लगे, शाम ठहरी रही राख से सर्द शोले उठाने लगे, शाम ठहरी रही अव्वल अव्वल समाअत में महके हुए बे बहा ज़मज़मे मुस्कुराने लगे, सर उठाने लगे, शाम ठहरी रही तिश्नगी और मैं साथ चलते रहे तारे जलते रहे रेत की धुन पर हम गुनगुने लगे, शाम ठहरी रही कोई वहशत ज़दा उस गली में गया, वक़्त रुक सा गया फिर पलटने में उसको ज़माने लगे, शाम ठहरी रही नाम तेरा किसी ने लिया बज़्म में और तेरे मातमी आंख भरने लगी, नम छुपाने लगे शाम ठहरी रही एक खिड़की खुली याद की , तेज़ बारिश बरसने लगी नक्श़_ए_ला हासली जगमगाने लगे, शाम ठहरी रही इक क़दीमी तमन्ना के साहिल पे कच्चे घरोंदे थे हम तेज़ आंधी चली ,हम ठिकाने लगे , शाम ठहरी रही आईला ताहिर قربتوں کے نشے یاد آنے لگے ، شام ٹھہری رہی راکھ سے سرد شعلے اٹھانے لگے،شام ٹھہری رہی اول اول سماعت میں مہکے ہوئے بے بہا زمزمے  مسکرانے لگے ،سر اٹھانے لگے ،شام ٹھہری رہی تشنگی اور میں ساتھ چلتے رہے تارے جلتے رہے  ریت کی دھن پہ ھم گنگنانے لگے ،شام ٹھہری رہی کوئی وحشت زدہ اس گلی میں گیا، وقت رک سا گیا پھر پلٹنے میں اُس کو زمانے لگے ،شام ٹھہری رہی نام تیرا کسی نے لیا...

Ghazal_Poet_Faqeeh Haider

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،،غزل ،، چراغ نیند کی محراب تک نہیں آیا  قسم ہے آنکھ میں اک خواب تک نہیں آیا चराग़ नींद की मेहराब तक नहीं आया  क़सम है आँख मे एक ख़्वाब तक नहीं आया  سبھی نے شوق ِ شہادت میں سر کٹا دئیے ہیں کوئی بھی جنگ کے اسباب تک نہیں آیا सभी ने शौक़_ए_शहादत मे सर कटा दिए हैँ  कोई भी जंग के असबाब तक नहीं आया ہمارے عشق سے کیسے ملے جنوں کو فروغ  ہمارا عشق تب و تاب تک نہیں آیا हमारे इश्क़ से कैसे मिले जनूं को फ़रोग़  हमारा इश्क़ तब_ओ_ताब तक नहीं आया  ابھی مشیت ِ خالق نہیں پڑھی تونے ؟ ابھی تو سورہ ء احزاب تک نہیں آیا अभी मशीयत_ए_ख़ालिक़ नहीं पढ़ी तु ने  अभी तु सुरह_ए_अहज़ाब तक नहीं आया وہ رنگ زنگ ہوا یا بنا دھواں آخر  جو رنگ اس لب ِ نایاب تک نہیں آیا वह रंग रंग हुआ या बना धुआँ आख़िर  जो रंग उस लब_ए_नायब तक नहीं आया بھرے ہیں مشکوں میں مشکیزگاں نے دریا تک  ہمارے ہاتھ میں تالاب تک نہیں آیا भरे हैँ मुश्कों मे मुश्केजगाँ ने दरया तक  हमारे हाथ मे तालाब तक नहीं आया ندی چڑھی ہے کئی بار میری آنکھوں کی  مگر یہ سلسلہ سیلاب تک نہیں آیا नदी चढ़ी है कई बार मेरी आँखों...

Ghazal_Poet_Zamir Qais

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शीशे जैसे अक्स को ओढ़ा जा सकता है दिल तो पत्थर का भी तोड़ा जा सकता है सूखे पौधों को भी दे सकते हैं पानी टूटे रिश्तों को भी जोड़ा जा सकता है खोले जा सकते हैं घर के सब दरवाज़े तन्हाई से मुंह भी मोड़ा जा सकता है मुश्किल है लेकिन थोड़ी सी कोशिश करके दिल के कुछ हिस्सों को जोड़ा जा सकता है ख़्वाबों की अंधी गलियों में आग लगाकर सोने वालों को झिंझोडा़ जा सकता है दिल को छूती रहती है जो आस हमेशा उस पगली का हाथ मरोड़ा जा सकता है रस्ता तकते तकते पत्थर हो जाती हैं वरना इन आंखों को फोड़ा जा सकता है है किस काम के दौलत, शोहरत, रिश्ते नाते साथ में कोई लेकर थोड़ा जा सकता है अब भी मेरे कपड़ों में है खुशबू उसकी हिज्र से अब भी विसल निचोड़ा जा सकता है जाने वाली गाड़ी पकड़ी जा सकती है ज़ख़्मी पैरों से भी दौड़ा जा सकता है सिगरेट नोशी सी बे लज़्ज़त आदत हूं मैं मुझको जब जी चाहे छोड़ा जा सकता है इश्क़ नगर है उजड़े दिल वालों की बस्ती कै़स तो करके सीना चौड़ा जा सकता है ज़मीर कै़स شیشے جیسے عکس کو اوڑھا جا سکتا ہے دل تو پتھر کا بھی توڑا جا سکتا ہے سوکھے پودوں کو بھی دے سکتے ہیں پانی ٹوٹے رشتوں کو بھی جوڑا جا سکتا ہ...

Ghazal_Poet_Dr.Kabir Athar

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पलक से रूह तलक सोगवार बैठा हूं मैं सब्र_ओ_शुक्र की खिल'त उतार बैठा हूं और अब तो खा़क से बाहर हैं कोंपले मेरी जो वक्त मुझ पे कड़ा था गुज़ार बैठा हूं वह ताक़ ए दिल से हो या ताक़ ए जिंदगानी से मैं हर चिराग़ पे परवाना वार बैठा हूं न जाने किस लिए मैने संभाल रखा था वह हौसला जो मुसीबत में हार बैठा हूं मुझे अंधेरों ने महसूर कर लिया है कबीर ये किस चिराग़ को मैं फूंक मार बैठा हूं शायर डॉक्टर कबीर अतहर پلک سے روح تلک سوگوار بیٹھا ہوں میں صبر و شکر کی خلعت اُتار بیٹھا ہوں اور اب تو خاک سے باہر ہیں کونپلیں میری جو وقت مجھ پہ کڑا تھا گزار بیٹھا ہوں وہ طاقِ دل سے ہو یا طاقِ زندگانی سے میں ہر چراغ پہ پروانہ وار بیٹھا ہوں نجانے کس لیے میں نے سنبھال رکھا تھا وہ حوصلہ جو مصیبت میں ہار بیٹھا ہوں مجھے اندھیروں نے محصور کر لیا ہے کبیر یہ کس چراغ کو میں پھونک مار بیٹھا ہوں #شاعر ڈاکٹر کبیر اطہر

Ghazal_Poet_Sarwat Mukhtar

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दर्द तहरीर कर लिया जाए ग़म को तस्वीर कर लिया जाए करबला को अगर जरूरत हो खूं जिगर चीर कर लिया जाए दर्द छलके ना आंख से टपके मिसरा ए मीर कर लिया जाए खुद को कैदी अगर बनाना हो तुमको ज़ंजीर कर लिया जाए झुटे ख़्वाबों का एक ताज महल फिर से तामीर कर लिया जाए भर के सरवत मिठास लहजे में बात को तीर कर लिया जाए सरवत मुख्तार درد تحریر کر لیا جائے  غم کو تصویر کر لیا جائے  کربلا کو اگر ضرورت ہو  خوں ، جگر چیر کر لیا جائے  درد چھلکے نا آنکھ سے ٹپکے  مصرع۔ میر کر لیا جائے  خود کو قیدی اگر بنانا ہو. تم کو زنجیر کر لیا جائے  جھوٹے خوابوں کا ایک تاج محل. پھر سے تعمیر کر لیا جائے؟  بھر کے ثروت مٹھاس لہجے میں. بات کو تیر کر لیا جائے  ثروت مختار

Sher_Poet_Suhail Rai

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ہم کسی آنکھ کے شہر میں قید ہیں  زندگی نیند ہے آدمی خواب ہیں سہیل رائے हम किसी आंख के शहर में क़ैद हैं ज़िंदगी नींद है आदमी ख़्वाब है सोहैल राय

Sher_Poet_Isar Shaukat

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किताब ए कै़स से नुस्खा़ निकाल लाया हूं वबा ए ग़म के मरीज़ो दवाई ले जाओ इसार کتاب قیس سے نسخہ نکال لایا ہوں وبائے غم کے مریضو دوائی لے جاؤ                             ایثار

Sher_Poet_Hasan Zaidi

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तुम्हारे ‌बाद किसी और को जुदा करके पुराने ग़म को मनाया गया नया करके हसन ज़ैदी تمہارے بعد کسی اور کو جدا کر کے  پرانے غم کو منایا گیا نیا کر کے  حسن زیدی

Sher_Poet_Naeem Ahmad Naeem

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Sher_Poet_Asif Mahmood Kaifi

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तुम्हारे ख़त भी सलामत तुम्हारी खु़शबू भी तुम अब भी ऐसा समझती हो कितनी पागल हो आसिफ़ महमूद कैफ़ी تمہارے خط بھی سلامت تمہاری خوشبو بھی تم اب بھی ایسا سمجھتی ھو کتنی پاگل ھو ! آصؔف محمود کیفی

Sher_Poet_Ghazal Qazi

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इस क़दर ज़ब्त ने तोड़ा है मुझे नक्श़ चेहरे पर उभर आए हैं ग़ज़ल क़ाज़ी اِس قدر ضبط نے توڑا ہے مجھے  نقش چہرے پہ اُبھر آئے ہیں  __ غزل قاضی

Ghazal_Poet_Zahid Khan

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क़बूल है दिल ए नादां को हर कहा उसका यह कौन है जो सुनता है मुद्द'आ उसका भुला दिया था उसे वक्त के थपेड़ों ने हवा ए शब ने  मगर ज़िक्र कर लिया उसका सराब होती हुई मौज की तलब में कहीं भटक गया है ज़माने से नाख़ुदा उसका तवील चुपकी सरासिमगी  क़यामत में बहाल हो ही गया दिल से राब्ता उसका अजल नहीं कि वो रस्ता है ज़िंदगानी का बहुत चखा है ज़माने ने जा़यका़ उसका तवील शब की ब्रागेंख़ता  सयाही में चमक रहा है बहुत दूर नक्श़ पा उसका बहुत  ही खुश हुआ एक दिन यह राज़ जान के वह बहुत अकेला है उसकी तरह ख़ुदा उसका जा़हिद खा़न قبول ہے دلِ ناداں کو ہر کہا اُس کا یہ کون ہے جو سُناتا ہے مُدّعا اُس کا بُھلا دیا تھا اُسے وقت کے تھپیڑوں نے ہوائے شب نے مگر ذکر کر لیا اُس کا سراب ہوتی ہوئی موج کی طلب میں کہیں بھٹک گیا ہے زمانے سے ناخُدا اُس کا طویل چُپ کی سراسیمگی قیامت میں بحال ہو ہی گیا دل سے رابطہ اُس کا اَجل نہیں کہ وہ رستہ ہے زندگانی کا بہت چکھا ہے زمانے نے ذائقہ اُس کا طویل شَب کی برانگیختہ سیاہی میں چمک رہا ہے بہت دور نقشِ پا اُس کا بہت ہی خوش ہوا اک دن یہ راز جان کے وہ بہت اکیلا ہے...