Nazm(कविता)_Mai Sochta Hun_Poet Iftekhar Bukhari
मैं सोचता हूं अगर दो रास्ते होते तुम तक जाने के लिए किसी बाग़ में चहल कदमी की तरह यख़ बसता पहाड़ों में सफे़द सुरंगो जैसे अगर दो ख़्वाब होते सहमी हुई ख़ामोश रातों में जागने के लिए सोने के लिए अगर दो जंगल होते पुर असरारी में भटकने के लिए या दुनिया दारों से कटने के लिए अगर दो परिंदे होते मोहब्बत के लिए अगर दो सराब होते प्यासा जीने के लिए प्यासा मरने के लिए अगर दो कहानियां होतीं कंदीम चट्टान पर कंदा ना क़ाबिले फ़हम नक़ूश में मदफ़ून याद करने के लिए भूल जाने के लिए अगर दो गीत होते मेरे जीते जी आखिरी हिचकी की लेने के लिए या मेरे बाद कुछ पल मुझे रोने के लिए अगर दो सितारे होते सुबह काज़िब की दहलीज़ पर चमकने के लिए बुझने के लिए उम्र गुज़ार कर मैं सोचता हूं यह मुमकिन नहीं इस दुनिया की बे इंतहाई में दो चीज़ें नहीं होतीं सिवाय दो तन्हाइयों के तू और मैं इफ़्तिख़ार बुखा़री میں سوچتا ہوں ۔ اگر دو راستے ہوتے تم تک جانے کے لیے کسی باغ میں چہل قدمی کی طرح یخ بستہ پہاڑوں میں سفید سرنگوں جیسے اگر دو خواب ہو...