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Showing posts with the label Hindi Shayri Blog

Sheir_Poet_Zubair Qaisar

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कुछ और भी मुझे लगने लगी हसीं दुनिया वो शहर_ए_ख़्वाब से निकला है मुस्कुराते हुए ज़ुबैर क़ैसर کچھ اور بھی مجھے لگنے لگی حسیں دنیا وہ شہر ۔ خواب سے نکلا ہے مسکراتے ہوئے ۔۔۔۔ ۔۔۔ زبیر قیصر

Ghazal_, Poet_Faqeeh Haider

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कूफ़ियो जैसे मोमनीन के नाम यह गज़ल है मुनाफ़िकी़न के नाम एक नारा खि़रद की हालत में दिन-ब-दिन बढ़ते जाहिलीन के नाम ख़ाक के साथ हो गया हूं ख़ाक और मैं क्या करूं ज़मीन के नाम यह मेरा आख़री तमाशा है सब की सब दाद शायकी़न के नाम रोज़ लिखता हूं पानियों पर मैं कर्बला तेरे जा़यरीन के नाम एक तवायफ़ के जिस्म पर लिखे हैं शहर के सारे सालेहीन के नाम फ़कीह ‌हैदर کوفیوں جیسے مومنین کے نام  یہ غزل ہے منافقین کے نام  ایک نعرہ خرد کی حالت میں  دن بہ دن بڑھتے جاہلین کے نام  خاک کے ساتھ ہو گیا ہوں خاک  اور میں کیا کروں زمین کے نام یہ مرا آخری تماشاہے  سب کی سب داد شائقین کے نام   روز لکھتا ہوں پانیوں پر میں  کربلا تیرے زائرین کے نام  اک طوائف کے جسم پر لکھے ہیں  شہر کے سارے صالحین کے نام  فقیہ حیدر

Nazm(कविता)_Mai Sochta Hun_Poet Iftekhar Bukhari

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मैं सोचता हूं अगर दो रास्ते होते तुम तक जाने के लिए किसी बाग़ में चहल कदमी की तरह यख़ बसता पहाड़ों में सफे़द सुरंगो जैसे अगर दो ख़्वाब होते सहमी हुई ख़ामोश रातों में जागने के लिए  सोने के लिए अगर दो जंगल होते पुर असरारी में भटकने के लिए या दुनिया दारों से कटने के लिए अगर दो परिंदे होते   मोहब्बत के लिए अगर दो सराब होते  प्यासा जीने के लिए प्यासा मरने के लिए अगर दो कहानियां होतीं कंदीम चट्टान पर कंदा ना क़ाबिले फ़हम नक़ूश में मदफ़ून याद करने के लिए  भूल जाने के लिए अगर दो गीत होते  मेरे जीते जी आखिरी हिचकी की लेने के लिए या मेरे बाद कुछ पल  मुझे रोने के लिए अगर दो सितारे होते  सुबह काज़िब की दहलीज़ पर चमकने के लिए बुझने के लिए  उम्र गुज़ार कर  मैं सोचता हूं यह मुमकिन नहीं  इस दुनिया की बे इंतहाई में दो चीज़ें नहीं होतीं सिवाय दो तन्हाइयों के  तू  और मैं इफ़्तिख़ार बुखा़री میں سوچتا ہوں  ۔ اگر دو راستے ہوتے تم تک جانے کے لیے  کسی باغ میں چہل قدمی کی طرح  یخ بستہ پہاڑوں میں  سفید سرنگوں جیسے اگر دو خواب ہو...

Ghazal_Poet_Abdur Rehman Wasif

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غزل آپ کے درد گزیدوں کی زباں کھولتے ہیں لفظ قرطاس پہ جب دل کا دُھواں کھولتے ہیں  بڑھتی جاتی ہے تعفّن کی ہلاکت خیزی  زخم اپنے جو کبھی تشنہ لباں کھولتے ہیں منتظر شخص یہ بہتر ہے مزید آس نہ رکھ  دل کا دروازہ وہ ہر اک پہ کہاں کھولتے ہیں  آپ ترکش میں رَکھے تِیر برابر کر لیں ہم عزا خانہِ وَحشت زَدَگاں کھولتے ہیں  لب پہ لاتے ہیں وہ بس ایک تبسم کی رمق اور ہمکتے ہوئے دل رختِ گماں کھولتے ہیں آئیے ! آپ کو ملواتے ہیں بیداری سے  آئیے ! آپ پہ ترتیبِ زماں کھولتے ہیں ۔۔۔۔۔۔۔ عبدالرحمان واصف आप के दर्द गजी़दों की जु़बान खोलते हैं लफ्ज़ कि़रतास पर जब दिल का धुंआ खोलते हैं बढ़ती जाती है त'अफ़्फ़ुन की हिलाकत खैजी  ज़ख्म अपने जो कभी तिश्ना-लबां खोलते हैं मुंतज़िर शख्स ये बेहतर है मजी़द आस न रख दिल का दरवाज़ा वह हर एक पर कहां खोलते हैं आप तरकश में रखे तीर बराबर कर लें हम अज़ा ख़ान_ए_ वहशत ज़दगां खोलते हैं लब पे लाते हैं वह बस एक तबस्सुम की रमक़ और हमकते हुए दिल रख़त_ए_ गुमां खोलते हैं आइए आपको मिलवाते हैं बेदारी से आइए आप पे ये तरतीबे ज़मा खोलते हैं...

Ash'aar_Poet_Shahzad Nayyar

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سایہء درد جو نکلا مرے قد سے بڑھ کر میں نے بے درد کو چاہا بھی تو حد سے بڑھ کر साया_ए_दर्द जो निकला मेरे क़द से बढ़ कर मैंने बेदर्द को चाहा भी तो हद से बढ़ कर واعظو ! خواہشِ زر بھی تو شرارِ شر ہے دل کو یہ آگ جلاتی ہے حسد سے بڑھ کر वाइज़ो । ख़्वाहिश_ए_जर भी तो शरारे शर है दिल को ये आग जलाती है हसद से बढ़ कर دشتِ لیلٰی کا مسافر ہے تو اِتنا سُن لے  اپنی آنکھوں میں جُنُوں باندھ، خِرد سے بڑھ کر दश्त_ए_लैला का मुसाफ़िर है तो इतना सुन ले अपनी आंखों में जूनूं बांध ख़िरद से बढ़ कर शहजाद नय्यर

Ghazal_Poet_Sarwat Mukhtar

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दर्द तहरीर कर लिया जाए ग़म को तस्वीर कर लिया जाए करबला को अगर जरूरत हो खूं जिगर चीर कर लिया जाए दर्द छलके ना आंख से टपके मिसरा ए मीर कर लिया जाए खुद को कैदी अगर बनाना हो तुमको ज़ंजीर कर लिया जाए झुटे ख़्वाबों का एक ताज महल फिर से तामीर कर लिया जाए भर के सरवत मिठास लहजे में बात को तीर कर लिया जाए सरवत मुख्तार درد تحریر کر لیا جائے  غم کو تصویر کر لیا جائے  کربلا کو اگر ضرورت ہو  خوں ، جگر چیر کر لیا جائے  درد چھلکے نا آنکھ سے ٹپکے  مصرع۔ میر کر لیا جائے  خود کو قیدی اگر بنانا ہو. تم کو زنجیر کر لیا جائے  جھوٹے خوابوں کا ایک تاج محل. پھر سے تعمیر کر لیا جائے؟  بھر کے ثروت مٹھاس لہجے میں. بات کو تیر کر لیا جائے  ثروت مختار

Sher_Poet_Isar Shaukat

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किताब ए कै़स से नुस्खा़ निकाल लाया हूं वबा ए ग़म के मरीज़ो दवाई ले जाओ इसार کتاب قیس سے نسخہ نکال لایا ہوں وبائے غم کے مریضو دوائی لے جاؤ                             ایثار