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Sheir_Poet_Azhar Fragh

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کسی نے دل نہیں دیکھا ہمارا کشادہ صرف پیشانی نہیں ہے  اظہر فراغ किसी ने दिल नहीं देखा हमारा कुशादा सिर्फ़ पैशानी नहीं है अज़हर फ़राग़

Ghazal_Poet_Iqbal Naveed

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मैं था कि मेरे साथ कोई जागता रहा लगता है  सारी रात कोई जागता रहा थपकी के साथ कोई सुलाता रहा मुझे मै सो गया तो हाथ कोई जागता रहा ऐसा सफ़र था नींद में चलते रहे क़दम जैसे दरून_ए_ज़ात़  कोई जागता रहा पहलू बदल बदल के रहे खेत में मगन होने लगी थी मात कोई जागता रहा चोरों की तरह वक़्त गुज़ारा मचान पर शब भर लगा के घात कोई जागता रहा इक सम्त शोर दिल का मगर दूसरी तरफ़ ख़ामोश इहतेयात कोई जागता रहा वो आग थी नवीद कि जलती रही ज़मीं बहता रहा फ़रात कोई जागता रहा इक़बाल नवीद غزل ۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔ میں تھا کہ میرے ساتھ کوئی جاگتا رہا لگتا ہے ساری رات کوئی جاگتا رہا تھپکی کے ساتھ کوئی سُلاتا رہا مجھے میں سو گیا تو ہاتھ کوئی جاگتا رہا ایسا سفر تھا نیند میں چلتے رہے قدم جیسے درونِ ذات کوئی جاگتا رہا پہلو بدل بدل کے رہے کھیل میں مگن ہونے لگی تھی مات کوئی جاگتا رہا چوروں کی طرح وقت گزارا مچان پر شب بھر لگا کے  گھات کوئی جاگتا رہا اک سمت شور دل کا مگر دوسری طرف خاموش  احتیاط  کوئی  جاگتا  رہا وہ آگ تھی نوید کہ جلتی رہی زمین بہتا  رہا  فرات  کوئی  جاگت...

Ghazal_Poet_Abdur Rahman wasif

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پہلے تو خود کا نام و نسب دیکھتا ہوں میں  پھر دل میں آپ ہی کی طلب دیکھتا ہوں میں اب کون تجھ سے آ کہ کہے میرا مدعا  وحشت سے خود کو مہر بلب دیکھتا ہوں میں ورنہ تجھے بتاتا میں، کیا شے ہے بے رخی  افسوس دوست ! حدِ ادب دیکھتا ہوں میں جب کوئی مجھ کو حرفِ ملامت سے زخم دے  اِس ربطِ پائمال کو تب دیکھتا ہوں میں دنیا ! اسے پسند بہت ہے ترا طریق ورنہ تیرے وجود کو کب دیکھتا ہوں میں کب تک انتظار کی دہلیز چومتا وہ شخص کہہ رہا تھا کہ اب دیکھتا ہوں وحشت میں کوستا ہوں دلِ نامراد کو جب اپنے دل میں اس کی طلب دیکھتا ہوں میں شاید تمہارے ہجر کی زحمت قریب ہے  دل میں کسی فشار کی چھب دیکھتا ہوں میں عبدالرحمان واصف पहले तो ख़ुद का नाम_ओ_नसब देखता हूं मैं फिर दिल में आप ही की तलब देखता हूं मैं अब कौन तुझसे आ के कहे मेरा मुद्द'आ वहशत से ख़ुद को मोहर_ए_ ब-लब देखता हूं मैं वरना तुझे बताता मैं क्या है बेरुखी अफ़सोस दोस्त! हद_ए_अदब देखता हूं मैं जब कोई मुझको हरफ़_ए_मलामत से ज़ख्म दे उस रब्त_ए_पाएमाल को तब देखता हूं मैं दुनिया । उसे पसंद बहुत है तेरा तरीक़ है  वरना तेरे वजूद को कब...

Nazm(Kavita)_Pamaal Khushbu_Poet_ Tahzeeb Abrar

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पामाल ख़ुशबू वो आखि़र होगई हासिल जो शए मतलूब थी तुमको अजल का खौफ़ बेमानी अजल महबूब थी तुमको तुम्हें शिकवा बहुत था ना कि मेरी जा़त के अंदर कोई आंधी सी चलती है हमेशा धूल उड़ती है गिला तुमको यही था ना कि मुझ में खारज़ारों का सुलगते रेग ज़ारों का अजब इक सिलसिला सा है उठो । देखो ज़रा आ कर तुम अपनी क़ब्र का मंज़र हज़ारों फूल महके हैं हज़ारों रंग बिखरे हैं तहज़ीब अबरार ( پامال خوشبو ) وہ آ خر ہوگئی حاصل جو شئے مطلوب تھی تم کو اجل کا خوف بے معنیٰ اجل محبوب تھی تم کو تمہیں شکوہ بہت تھا نا ! کہ میری ذات کے اندر  کوئی آ ندھی سی چلتی ہے ہمیشہ دھول اڑتی ہے گلہ تم کو یہی تھا نا ! کہ مجھ میں خارزاروں کا سلگتے ریگ زاروں کا عجب اک سلسلہ سا ہے  اٹھو ! دیکھو ذرا آ کر  تم اپنی قبر کا منظر  ہزاروں پھول مہکے ہیں ہزاروں رنگ بکھرے ہیں   تہذیب ابرار

Ash'aar_Poet_Arif Nazeer

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आंखों से किसी ख़ास गुज़ारिश का मज़ा ले मौसम की मज़ेदार नवाज़िश का मज़ा ले इस वक़्त हर एक ग़म को ताक़ पर रख कर आ खुल के मेरे साथ तू बारिश का मज़ा ले आरिफ़ नज़ीर   آنکھوں سے کسی خاص گزارش کا مزہ لے موسم کی مزیدار نوازش کا مزہ لے اس وقت ہر اک غم کو کہیں طاق پہ رکھ کر آ کھل کے مرے ساتھ تو بارش کا مزہ لے عارف نظیر

Sher_Ata Qazi Ata

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मै अपनी ज़ात से निकला तो यूं हुआ कि अता कुछ और फैल गया गम शश भी जिहात में अताउर रहमान क़ाज़ी میں اپنی ذات سے نکلا تو یوں ہوا کہ عطا کچھ اور پھیل گیا غم بھی شش جہات کے ساتھ عطاءالرحمن قاضی

Ghazal_Poet_Aaila Tahir

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क़ुर्बतों के नशे याद आने लगे, शाम ठहरी रही राख से सर्द शोले उठाने लगे, शाम ठहरी रही अव्वल अव्वल समाअत में महके हुए बे बहा ज़मज़मे मुस्कुराने लगे, सर उठाने लगे, शाम ठहरी रही तिश्नगी और मैं साथ चलते रहे तारे जलते रहे रेत की धुन पर हम गुनगुने लगे, शाम ठहरी रही कोई वहशत ज़दा उस गली में गया, वक़्त रुक सा गया फिर पलटने में उसको ज़माने लगे, शाम ठहरी रही नाम तेरा किसी ने लिया बज़्म में और तेरे मातमी आंख भरने लगी, नम छुपाने लगे शाम ठहरी रही एक खिड़की खुली याद की , तेज़ बारिश बरसने लगी नक्श़_ए_ला हासली जगमगाने लगे, शाम ठहरी रही इक क़दीमी तमन्ना के साहिल पे कच्चे घरोंदे थे हम तेज़ आंधी चली ,हम ठिकाने लगे , शाम ठहरी रही आईला ताहिर قربتوں کے نشے یاد آنے لگے ، شام ٹھہری رہی راکھ سے سرد شعلے اٹھانے لگے،شام ٹھہری رہی اول اول سماعت میں مہکے ہوئے بے بہا زمزمے  مسکرانے لگے ،سر اٹھانے لگے ،شام ٹھہری رہی تشنگی اور میں ساتھ چلتے رہے تارے جلتے رہے  ریت کی دھن پہ ھم گنگنانے لگے ،شام ٹھہری رہی کوئی وحشت زدہ اس گلی میں گیا، وقت رک سا گیا پھر پلٹنے میں اُس کو زمانے لگے ،شام ٹھہری رہی نام تیرا کسی نے لیا...

Sher_Poet_Shoaib Kiani

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जब मै कहता हूं ख़ुदा कैसा है दिखलाओ मुझे हर कोई अपनी ही तस्वीर उठा लाता है शोएब कयानी جب میں کہتا ہوں خدا کیسا ہے دکھلاؤ مجھے ہر کوئی اپنی ہی تصویر اٹھا لاتا ہے شعیب کیانی

Ghazal_Poet_Ehtisham Shami

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बदन के भेस में पलता गुलाब था कोई ख़बर नहीं वह हकीकत या ख़्वाब था कोई कुछ इस नज़र से उसे पारसा भी देखते थे कि उसको देखते रहना सवाब था कोई हमारे इश्क़ की बुनियाद उसने पूछी है सो अहल _ए_इश्क़ बताओ जवाब था कोई  चहार सम्त है फैली खलीज नफ़रत की किताब_ए_इश्क़ में नफ़रत का बाब था कोई ये मेकदे के हसीन रंग तो बताते हैं के मुझसे पहले यहां पर नवाब था कोई एहतिशाम शामी بدّن کے بھیس میں پلتا گلاب تھا کوئی خبر نہیں وہ حقیقت یا خواب تھا کوئی کچھ اس نظر سے اسے پارسا بھی دیکھتے تھے کہ اس کو دیکھتے رہنا ثواب تھا کوئی ہمارے عشق کی بنیاد اس نے پوچھی تھی سو اہل عشق بتاو جواب تھا کوئی؟ چہار سمت ہے پھیلی خلیج نفرت کی کتاب عشق میں نفرت کا باب تھا کوئی؟ یہ مے کدے کے حسیں رنگ تو بتاتے ہیں کہ مجھ سے پہلے یہاں پر نواب تھا کوئی             احتشام شامی Badan k bhess main palta gulaab tha koi khabar nahi wo haqeeqat ya khawaab tha koi kuch is Nazar se usy parsaa bhi daikhty thy k us ko daikhty rehna sawaab tha koi hamary ishq ki buniyaad us ny poochi ha so ehl-e-ishq bata...

Ghazal_Poet_Abdur Rehman Wasif

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अधूरा शेर जो होकर ग़ज़ल निकलता है हमारे सारे मसाइल का हल निकलता है कुछ अच्छा सोचो अगर ख़ुद में बेहतरीन चाहो कि हुसन_ए_फ़िक्र से हुसन_ए_अमल निकलता है हमी हैं जिनसे नुमु पा रही है विरानी हमें तो मिलके गुलिस्ता भी थल निकलता है हमारे सब्र का फल भी यहीं से फूटेगा इसी ज़मीं की दराड़ों से जल निकलता है उसे कहो कि ज़माने की चाल ठीक नहीं वो शख़्स घर से बहुत आजकल निकलता है अब्दुर रहमान वासिफ़ ادھورا شعر جو ہو کر غزل نکلتا ہے  ہمارے سارے مسائل کا حل نکلتا ہے کچھ اچھا سوچو اگر خود میں بہتری چاہو  کہ حسنِ فکر سے حسنِ عمل نکلتا ہے ہمی ہیں جن سے نمو پارہی ہے ویرانی  ہمیں تو مل کے گلستاں بھی تھل نکلتا ہے ہمارے صبر کا پھل بھی یہیں سے پھوٹے گا اسی زمیں کی دراڑوں سے جل نکلتا ہے اسے کہو کہ زمانے کی چال ٹھیک نہیں  وہ شخص گھر سے بہت آج کل نکلتا ہے ۔ ۔ ۔ عبدالرحمان واصف

Ash'aar_Poet_Shahzad Nayyar

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سایہء درد جو نکلا مرے قد سے بڑھ کر میں نے بے درد کو چاہا بھی تو حد سے بڑھ کر साया_ए_दर्द जो निकला मेरे क़द से बढ़ कर मैंने बेदर्द को चाहा भी तो हद से बढ़ कर واعظو ! خواہشِ زر بھی تو شرارِ شر ہے دل کو یہ آگ جلاتی ہے حسد سے بڑھ کر वाइज़ो । ख़्वाहिश_ए_जर भी तो शरारे शर है दिल को ये आग जलाती है हसद से बढ़ कर دشتِ لیلٰی کا مسافر ہے تو اِتنا سُن لے  اپنی آنکھوں میں جُنُوں باندھ، خِرد سے بڑھ کر दश्त_ए_लैला का मुसाफ़िर है तो इतना सुन ले अपनी आंखों में जूनूं बांध ख़िरद से बढ़ कर शहजाद नय्यर

Sher_Poet_Muhammad Iftikhar Ul Haq

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दरिया_ए_इख्ति़यार जो रस्ता बदल गया।।। सेहरा_ए_जबर तेरा भी नक़्शा  बदल गया मुहम्मद इफ़्तिख़ार उल हक़ دریائے اختیار جو رستا بدل گیا !!! صحرائے جبر تیرا بھی نقشہ بدل گیا Muhammad Iftikhar Ul Haq

Ghazal_Poet_Ahmed Imtiaz

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जवाब एक सा है और सवाल एक सा है ये क्या हुआ है कि दोनो का हाल एक सा है  बुलंदियों का वहां है तो पस्तियों का यहां है  बस आसमा_ओ_ज़मीं का कमाल एक सा है हर एक शख्स का अंजाम रायगानी है ये ज़िंदगी है तो सब पे वबाल एक सा है जुदाई  आंख में आंसू हैं मिलना खंदा ब लब फ़िराक एक सा सबका विसाल एक सा है कोई भी साअत खुश रंग आज तक न मिली हमारे वास्ते हर एक साल एक सा है  अहमद इम्तियाज جواب ایک سا ہے اور سوال ایک سا ہے یہ کیا ہوا ہے کہ دونوں کا حال ایک سا ہے بلندیوں کا وہاں ہے تو پستیوں کا  یہاں  بس آسمان و زمیں کا کمال ایک سا ہے ہر ایک شخص کا انجام رائیگانی ہے یہ زندگی ہے تو سب پہ وبال ایک سا ہے جدائی آنکھ میں آنسو ہیں ملنا خندہ بہ لب فراق ایک سا سب کا وصال ایک سا ہے کوئی بھی ساعت خوش رنگ آج تک نہ ملی ہمارے واسطے ہر ایک سال ایک سا ہے احمد امتیاز

Sher_Poet_Suhail Rai

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ہم کسی آنکھ کے شہر میں قید ہیں  زندگی نیند ہے آدمی خواب ہیں سہیل رائے हम किसी आंख के शहर में क़ैद हैं ज़िंदगी नींद है आदमी ख़्वाब है सोहैल राय

Ghazal_Poet_Faqeeh Haider

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दिल उजड़ जाए मेरी आंख भी वीरान ना हो कैसे मुमकिन है जुनूं में कोई नुकसान ना हो उंगलियां हम पे उठाते हैं वही सारे लोग जिनका अपना कोई शजरा कोई पहचान ना हो इतनी वीरानी कभी पहले नहीं देखी थी कोई तो मुझसे कहे यार परेशान ना हो ख़ून देते हुए गुज़री है मेरी सारी उम्र जिंदगी कहता हूं मैं जिसको बलिदान ना हो ऐसे लोगों पे तरस आता है मुझको जिनका आंख होते हुए भी ख़्वाब पे ईमान ना हो फूल लाया है कोई मेरे लिए ठीक मगर जिसको गुलदान समझता हूं नमकदान ना हो किसी मुश्किल से गुजऱने की मुझे ख़्वाहिश है  ऐसी मुश्किल जो किसी तौर में आसाम ना हो दशत में घूमता हूं, नाचता हूं, सोचता हूं दशत भी मेरे मकां का कहीं दालान ना हो ऐसे लोगों में मेरी शायरी की क्या औका़त मो'तबर जिनके लिए मीर का दीवान ना हो उस उदासी पे अजीयत पे पड़े खा़क फ़कीह नम अगर आंख मेरी हिज्र के दौरान ना हो फ़की़ह हैदर ،، غزل ،، دل اُجڑ جائے مری آنکھ بھی ویران نہ ہو   کیسے ممکن ہے جنوں میں کوئی نقصان نہ ہو ؟ انگلیاں ہم پہ اٹھاتے ہیں وہی سارے لوگ    جن کا اپنا کوئی شجرہ کوئی پہچان نہ ہو اتنی ...

Ghazal_ Poet_ Shahla Khan

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कहीं जवाब कहीं पर दलील झूठी है  मगर हमारी वजा़हत फ़क़त खमोशी है हज़ारों मील की दूरी है दरम्यान मगर कहीं कहीं यह ज़मीं आसमां से मिलती है हव की सिम्त पे इल्ज़ाम रख दिया वरना महक की राह में हायल वह खिड़की है पुकार बर्फ़ के अंदर हनुत हो भी चुकी मगर वह गूंज अभी पर्वतों में बाकी है किसी की अर्जि़यां सुनने से क्या ग़र्ज़ तुमको यह बेनयाज़ी तेरी पत्थरों के जैसी है मजाल है कि कभी छोड़ दे अकेला हमें हमारे साथ हमारी उदासी रहती है मैं मरने लगती हूं लेकिन तेरी सदा फिर से  रुकी रुकी मेरी धड़कन बहाल करती है शहला ख़ान کہیں جواب کہیں پر دلیل جھوٹی ہے مگر ہماری وضاحت فقط خموشی ہے ہزاروں میل کی دوری ہے درمیان مگر کہیں کہیں یہ زمیں آسماں سے ملتی ہے ہوا کی سمت پہ الزام رکھ دیا ورنہ مہک کی راہ میں حائل وہ ایک کھڑکی ہے پکار برف کے اندر حنوط ہو بھی چکی مگر وہ گونج ابھی پربتوں میں باقی ہے کسی کی عرضیاں سننے سے کیا غرض تجھکو یہ بے نیازی تری پتھروں کے جیسی ہے مجال ہے کہ کبھی چھوڑ دے اکیلا ہمیں ہمارے ساتھ ہماری اداسی رہتی ہے میں مرنے لگتی ہوں لیکن تری صدا پھر سے رکی رکی مری دھڑکن بحا...

Nazm _Khalipan me neend ki khwahish _Poet _Ali zeyoof

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खा़लीपन में नींद की ख्वाहिश ग़शी नींद की कहकशाओ में प्रवेश करने के लिए मदार मुतॶय्यन नहीं कर सकती हम औंधे मुंह रेंग कर भी  तैरते सूरज से आगे नहीं निकल सकते  हमारे निशान मिटाता हुआ चांद मंजि़लें सर करते हुए खजूर की पुरानी  शाख़़ जैसा हो जाता है रात दिन पर सबक़त नहीं ले सकती अंतरिक्ष में तैरने के लिए  मदारो का पास लाज़िम है शम्सी चकरी को उल्टा घुमाने से रुपहली झूला टूट जाएगा दूरी व  नज़दीकी को पसे पुष्त डालकर हम प्लूटो  को घना गन नग़मे साकिन ज़मीन के अकब से सुना सकते हैं ज़हनी सुबक गांम घोड़ों को मेहमेज़े वहशत लगाकर दरियाओं का सीना चीरते जा निकलें  परले किनारे पर जहां उजली पोशाक  पहने  नींद हमारी मुन्तजि़र है हमारे दिल पर झुर्रियों का अंबार लगा है हमारी पोरों के प्यालों से दुआ चुरा ली गई है तसकीन‌ की र्ग़ज़ से बेदारी हमारी  आंखों को नोच लेगी "खा़लीपन में नींद की ख्वा़हिश करना बेवकूफी के मुतरादिफ़है अली जयूफ़ خالی پن میں نیند کی خواہش           غشی نیند کی کہکشاؤں میں  پرویش کرنے کیلئے مدار متع...

Nazm _Raqs kro_ Poet_Rashid Malik

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रक़्स करो दीवाना वारी रक़्स करो यू रक़्स करो के अंग अंग थिरके  थिरके शिरियानों में ख़ूं यूं रक़्स करो रक़्स करो कि झूमे जंगल ,बेलें, अंबर, धरती ,सारा आलम ऐसे रक़्स करो रक़्स करो कि ज़हन के दरवाजों से वहशत बिगडूट बाहर भागे ऐसे रक़्स करो रक़्स करो यूं कि जिस्म वक्त़ के क़ैद से बाहर हो जाए यूं रक़्स करो रक़्स करो यूं नूरी हैरत से थम जाए देखने वालों का ग़म जाए मन की कालक धुल जाए यू रक़्स करो रक़्स करो यूं सेहराओ में हरियाली हो जाए हर एक शक्ल निराली हो जाए यूं रक़्स करो रक़्स करो यूं बंजर आंखों में नम  आए ज़िंदा लाशों में दम आए ऐसे रक़्स करो रक़्स करो यूं  आंखों की बिनाई आए बहरे को आवाज़ बुलाए बहरा मारे शौक़ के गाए रक़्स करो दीवाना वारी रक़्स करो राशिद मलिक رقص کرو دیوانہ واری رقص کرو  یوں رقص کرو کہ انگ انگ تھرکے  تھرکے شریانوں میں خوں یوں رقص کرو رقص کرو کہ جھومیں جنگل ، بیلے ، امبر ، دھرتی،  سارا عالم ایسے رقص کرو  رقص کرو کہ ذہن کے دروازوں سے وحشت بگڈٹ باہر بھاگے ایسے رقص کرو  ‏رقص کرو یوں جسم وقت کے قید سے باہر ہو جائے یوں رقص کرو ...

Ghazal _Poet _ Atta Ur Rehman Qazi

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Ghazal _ Shakh der shakh शाख़ दर‌ शाख़ कोई जख़्म सजाने की सेवा काम ही क्या है तेरा हिज्र मनाने की सिवा पूछते क्या हो चीराग़ो से हवा का नाता याद कुछ हो भी तो बुझते चले जाने कि सिवा और भी शाम कोई, शामे जुदाई से अलग और भी काम कोई, बोझ उठाने के सिवा हम के थे अक्से गरिज़ां के गिरफ्तार सो‌ हम खुद से मिलते भी कहां ,आएना ख़ाने कि सिवा वह तो यूं है कि अता पासे जुनूं था वरना काम कुछ और भी  थे ख़ाक उड़ाने के सिवा अता उर हमान क़ाज़ी شاخ در شاخ کوئی زخم سجانے کے سوا کام ہی کیا ہے تیرا ہجر منانے کے سوا پوچھتے کیا ہو چراغوں سے ہوا کا ناتا یاد کچھ ہو بھی تو بجھتے چلے جانے کے سوا اور بھی شام کوئی, شام_ جدائی سے الگ اور بھی کام کوئی، بوجھ اٹھانے کے سوا ہم کہ تھے عکس_ گریزاں کے گرفتار  سو ہم خود سے ملتے بھی کہاں آئینہ خانے کے سوا وہ تو یوں ہے کہ عطا پاس_ جنوں تھا ورنہ کام کچھ اور بھی  تھے خاک اڑانےکے سوا عطاء الرحمٰن قاضی

Sher _ Atta_ur_ Rahman Qazi

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शेर अभी से कैसे बताऊं के क्या है पेशे नज़र अभी तो दिल को तेरी कैद से निकलना है अताउर रहमान क़ाज़ी ابھی سے کیسے بتاؤں کہ کیا ہے پیش ِ نظر ابھی  تو  دل  کو  تری  قید  سے  نکلنا  ہے عطاءالرحمن قاضی