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Ghazal _ Farrukh Adeel

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इसलिए भी खालो खद झुलसे हुए पाए गए हम पराई आग में जलते हुए पाए गए दशत को सर सब्ज  देखा रात मैंने ख़्वाब में सुबह  को दरिया मेरे सूखे हुए पाए गए हम वहां पर भी बिखेर आए हैं अपनी रोशनी जिस जगह जुगनू कई रोते हुए पाए गए बारहा हाथों से तेरे टूटने के बावजूद जब भी हम तुझसे मिले हंसते हुए पाए गए मौत से आंखें मिलाकर बातें करने वाले लोग ज़िंदगी के सामने सहमे हुए पाए गए सिर्फ इतना याद है लिपटे थे‌ इक साए से हम देखते ही देखते बिखरे हुए पाए गए हम शजर वह है कि जिन पर बारिशें  बे फ़ायदा भीग कर भी प्यास से मरते हुए पाए गए फर्रुख  अदील غزل  اِس لیے بھی خال و خد جھلسے ہوئے پائے گئے  ہم پرائی آگ میں جلتے ہوئے پائے گئے دشت کو سرسبز دیکھا رات میں نے خواب میں صبح کو دریا مرے سوکھے ہوئے پائے گئے  ہم وہاں پر بھی بکھیر آئے ہیں اپنی روشنی  جس جگہ جگنو کئی روتے ہوئے پائے گئے بارہا ہاتھوں سے تیرے ٹوٹنے کے باوجود  جب بھی ہم تجھ سے ملے ہنستے ہوئے پائے گئے  موت سے آنکھیں ملا کر بات کرنے والے لوگ زندگی کے سامنے سہمے ہوئے پائے گئے  صرف اتنا یاد ہے لپٹے تھے اک سائے سے...