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Ghazal_Poet_Azra Naaz

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न हसीन मिसले गुलाब हूं न किसी की आंख का ख़्वाब हूं तेरी ज़िंदगी की किताब का मगर एक छोटा सा बाब हूं मेरे हर्फ़ हर्फ़ में नुद्रतें, मेरे बाब बाब मे हैरतें कभी तू ने जिस को छुआ नही, मैं वो एक कोरी किताब हूं मेरी अपनी शक्ल नही कोई तू ने जैसे ढाला मै ढल गई है ये फ़ैसला तेरे हाथ में मैं अज़ाब हूं कि सवाब हूं तेरे ज़ौक_ए_मय के शबाब को नया चाहिए कोई अब नशा नशा जिस का उतरे न देर तक, वही मै पुरानी शराब हूं ये जहान बहर है बेकरां मेरी हैसियत ही भला है क्या मेरा नाम क्या मेरी जा़त क्या मैं तो सिर्फ़ मिसले हबाब हूं जो शरीक_ए_जुर्म था हमनवा वो तो जाने कब का रिहा हुआ  हुआ माजरा मेरे साथ क्या मैं अभी भी जे़र_ए_इताब हूं अज़रा नाज़  U.K غزل عذرا ناز یو کے ---------- نہ حسین مثل ِ گلاب ہوں نہ کسی کی آنکھ کا خواب ہوں تری زندگی کی کتاب کا مگر ایک چھوٹا سا باب ہوں مرے حرف حرف میں ندرتیں مرے باب باب میں حیرتیں کبھی تو نے جس کو چھوا نہیں میں وہ ایک کوری کتاب ہوں مری اپنی شکل نہیں کوئی تو نے جیسے ڈھالا میں ڈھل گئی ہے یہ فیصلہ ترے ہاتھ میں میں عذاب ہوں کہ ثواب ہوں ترے ذوقِ مے کے شباب کو نیا چاہئیے کوئ...