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#Urdu Poetry #Hindi Poetry

Ghazal_Poet_Maouvez Hasan

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उदासी चिड़चिड़ापन रतजगा है कोई आसेब‌ मुझ में पल रहा है जहां की‌ इरतकाई साजि़शों में जमीं एक मो'जजा़ती हादसा है मेरे अंदर का आवारा मुसाफ़िर ख़्यालों की ट्रैफ़िक में फंसा है ख़सारों पर भी खुल कर हंस रहे हैं हमारा कर्ब बूढ़ा हो गया है कई हफ़्तों से सरवत पढ़ रहा था और अब दिल पटरियों पर चल रहा है मुसव्विर ने मेरा चेहरा बनाकर ख़सारा कैनवस पर धर दिया है तुम्हारी ओर देखा, और देखा नदी का रंग पीला पड़ गया है मैं उसके वसवसों में आ गया हूं वह जिससे टेलिफो़निक राब्ता है घड़ी की सुइयां उल्टी घुमाकर मुक़द्दर हम को थप्पड़ मारता है मोहब्बत की लड़ाई में मु'अव्विज़ तकल्लुफ़ इबतदाई सानेहा है मु'अव्विज़ हसन اداسی چڑچڑاپن رتجگا ہے  کوئی آسیب مجھ میں پل رہا ہے  جہاں کی ارتقائی سازشوں میں  زمیں اک معجزاتی حادثہ ہے  مرے اندر کا آوارہ مسافر  خیالوں کی ٹریفک میں پھنسا ہے خساروں پر بھی کھل کر ہنس رہے ہیں ہمارا کرب بوڑھا ہو گیا ہے   کئی ہفتوں سے ثروت پڑھ رہا تھا اور اب دل پٹریوں پر چل رہا ہے  مصور نے مرا چہرہ بنا کر  خسارہ کینوس پر دھر دیا ہے تمہاری اور دیکھا، اور دیکھ...

Ghazal_Poet_Zeeshan Murtaxa

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कोई चिराग़ कोई ताक़ मुन्ताजि़र है मेरा इक आइना पस_ए_अफ़लाक मुन्तजि़र है मेरा मैं इस जहान से निकला तो ये खुला मुझ पर कोई जहान तहे ख़ाक मुन्तजि़र है मेरा ये अंदरून से आती है एक सदा... कि कोई दरून_ए_दश्त.. .क़बा चाक!!  मुन्तजि़र है मेरा इसी ख़्याल में पहरों सुलग चुका हूं मैं कि इक जुनू़ं तहे पेचाक मुन्तजि़र है मेरा मेरे नसीब में लिखी है ये फ़लक गर्दी कोई ख़ला पसे आफा़क़ मुन्तजि़र है मेरा वह इक झील तेरी राह देखती है अभी वह इक सितारा_ए_बेबाक मुन्तजि़र है मेरा ज़ीशान मुर्तजा़ تازہ غزل کوئی چراغ کوئی طاق منتظر ہے مرا اک آئینہ پس ِ افلاک منتظر ہے مرا میں اس جہان سے نکلا تو یہ کھلا مجھ پر کوئی جہان تہہ ِ خاک منتظر ہے مرا یہ اندرون سے آتی ہے اک صدا۔۔ کہ کوئی   درون ِ دشت .. قبا چاک !! منتظر ہے مرا اسی خیال میں پہروں سلگ چکا ہوں میں  کہ اک جنوں تہہِ پیچاک منتظر کے مرا  مرے نصیب میں لکھی ہے یہ فلک گردی کوئی خلا پسِ آفاق منتظر ہے مرا  وہ ایک جھیل تری راہ دیکھتی ہے ابھی  وہ اک ستارہء بے باک منتظر ہے مرا ذی شان مرتضےٰ

Sheir_Poet_Rahat Sarhadi

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فریب کھایا ہے ایسا کہ زہر لگتی ہے  مجھے تو لوگوں کے چہروں پہ مسکراہٹ تک  راحتؔ سرحدی फ़रेब खाया है ऐसा कि ज़हर लगती है मुझे तो लोगों के चेहरे पे मुस्कुराहाट तक राहत सरहदी

Sheir_Poet_Azhar Fragh

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کسی نے دل نہیں دیکھا ہمارا کشادہ صرف پیشانی نہیں ہے  اظہر فراغ किसी ने दिल नहीं देखा हमारा कुशादा सिर्फ़ पैशानी नहीं है अज़हर फ़राग़

Sheir_Poet_Arshad Malik

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تم کیا گئے۔۔۔۔ کہ وقت کا احساس مر گیا راتوں کو جاگتے رهے اور دن میں سو گئے ارشد ملک तुम क्या गए .. कि वक़्त का एहसास मर गया रातों को जागते रहे और दिन में सो गाए अरशद मालिक

Ghazal_Poet_Azra Naaz

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न हसीन मिसले गुलाब हूं न किसी की आंख का ख़्वाब हूं तेरी ज़िंदगी की किताब का मगर एक छोटा सा बाब हूं मेरे हर्फ़ हर्फ़ में नुद्रतें, मेरे बाब बाब मे हैरतें कभी तू ने जिस को छुआ नही, मैं वो एक कोरी किताब हूं मेरी अपनी शक्ल नही कोई तू ने जैसे ढाला मै ढल गई है ये फ़ैसला तेरे हाथ में मैं अज़ाब हूं कि सवाब हूं तेरे ज़ौक_ए_मय के शबाब को नया चाहिए कोई अब नशा नशा जिस का उतरे न देर तक, वही मै पुरानी शराब हूं ये जहान बहर है बेकरां मेरी हैसियत ही भला है क्या मेरा नाम क्या मेरी जा़त क्या मैं तो सिर्फ़ मिसले हबाब हूं जो शरीक_ए_जुर्म था हमनवा वो तो जाने कब का रिहा हुआ  हुआ माजरा मेरे साथ क्या मैं अभी भी जे़र_ए_इताब हूं अज़रा नाज़  U.K غزل عذرا ناز یو کے ---------- نہ حسین مثل ِ گلاب ہوں نہ کسی کی آنکھ کا خواب ہوں تری زندگی کی کتاب کا مگر ایک چھوٹا سا باب ہوں مرے حرف حرف میں ندرتیں مرے باب باب میں حیرتیں کبھی تو نے جس کو چھوا نہیں میں وہ ایک کوری کتاب ہوں مری اپنی شکل نہیں کوئی تو نے جیسے ڈھالا میں ڈھل گئی ہے یہ فیصلہ ترے ہاتھ میں میں عذاب ہوں کہ ثواب ہوں ترے ذوقِ مے کے شباب کو نیا چاہئیے کوئ...

Ghazal_Poet_Abdur Rahman wasif

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پہلے تو خود کا نام و نسب دیکھتا ہوں میں  پھر دل میں آپ ہی کی طلب دیکھتا ہوں میں اب کون تجھ سے آ کہ کہے میرا مدعا  وحشت سے خود کو مہر بلب دیکھتا ہوں میں ورنہ تجھے بتاتا میں، کیا شے ہے بے رخی  افسوس دوست ! حدِ ادب دیکھتا ہوں میں جب کوئی مجھ کو حرفِ ملامت سے زخم دے  اِس ربطِ پائمال کو تب دیکھتا ہوں میں دنیا ! اسے پسند بہت ہے ترا طریق ورنہ تیرے وجود کو کب دیکھتا ہوں میں کب تک انتظار کی دہلیز چومتا وہ شخص کہہ رہا تھا کہ اب دیکھتا ہوں وحشت میں کوستا ہوں دلِ نامراد کو جب اپنے دل میں اس کی طلب دیکھتا ہوں میں شاید تمہارے ہجر کی زحمت قریب ہے  دل میں کسی فشار کی چھب دیکھتا ہوں میں عبدالرحمان واصف पहले तो ख़ुद का नाम_ओ_नसब देखता हूं मैं फिर दिल में आप ही की तलब देखता हूं मैं अब कौन तुझसे आ के कहे मेरा मुद्द'आ वहशत से ख़ुद को मोहर_ए_ ब-लब देखता हूं मैं वरना तुझे बताता मैं क्या है बेरुखी अफ़सोस दोस्त! हद_ए_अदब देखता हूं मैं जब कोई मुझको हरफ़_ए_मलामत से ज़ख्म दे उस रब्त_ए_पाएमाल को तब देखता हूं मैं दुनिया । उसे पसंद बहुत है तेरा तरीक़ है  वरना तेरे वजूद को कब...

Sher_Poet_Amaanullah Khan Amaan

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इक रिदा_ए_खाम्शी ओढ़ी है सारे शहर ने हर बदन ज़ख्मी है लेकिन बोलता कोई नही AmaanUllah Khan Amaan اک ردائے خامشی اوڑھی ھے سارے شہر نے  ہر بدن زخمی ہے لیکن بولتا کوئی نہیں ۔ امان اللہ خان امانؔ