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Ghazal_Poet _Aftab Aariz

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खौ़फ़ था बला का और रात काफ़ी सर्दी थी मैंने अपने सीने पर एक किताब धर दी थी ख़्वाब ख़्वाब लगता है अब मुझे हर एक मंज़र उसने मेरी आंखों में इतनी नींद भर दी थी कल  उदास देखा था मैंने पहली बार उसको धूप जैसे चेहरे पर शाम जैसी ज़र्दी थी हम छुपाए फिरते थे दिल में अपनी महरूमी देख कर उसे लेकिन सर्द आह भर दी थी मैं सफ़र पर निकला था जब बगैर ज़ादे ज़ार एक दुआ मेरी मां ने माथा चूम कर दी थी एक हसीन धोखा है यह रफाक़ते  दुनिया बेख़बर तुम्हें मैंने पहले ही ख़बर दी थी हर पड़ाव पर मुझको सोचना पड़ा आरिज़ कौन लोग थे जिन पर सहल रह नूर दी थी आफ़ताब आरिज़ خوف تھا بلا کا اور رات کافی سردی تھی میں نے اپنے سینے پر اک کتاب دھر دی تھی خواب خواب لگتا ہے اب مجھے ہر اک منظر اس نے میری آنکھوں میں اتنی نیند بھر دی تھی کل اداس دیکھا تھا میں نے پہلی بار اس کو دھوپ جیسے چہرے پر شام جیسی زردی تھی ہم چھپائے پھرتے تھے دل میں اپنی محرومی دیکھ کر اسے لیکن سرد آہ بھر دی تھی میں سفر پہ نکلا تھا جب بغیر زادِ راہ اک دعا مری ماں نے ماتھا چوم کر دی تھی اک حسین دھوکا ہے یہ رفاقتِ دنیا  بے خبر تمہی...