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Ghazal_Poet_Faqeeh Haider

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،،غزل ،، چراغ نیند کی محراب تک نہیں آیا  قسم ہے آنکھ میں اک خواب تک نہیں آیا चराग़ नींद की मेहराब तक नहीं आया  क़सम है आँख मे एक ख़्वाब तक नहीं आया  سبھی نے شوق ِ شہادت میں سر کٹا دئیے ہیں کوئی بھی جنگ کے اسباب تک نہیں آیا सभी ने शौक़_ए_शहादत मे सर कटा दिए हैँ  कोई भी जंग के असबाब तक नहीं आया ہمارے عشق سے کیسے ملے جنوں کو فروغ  ہمارا عشق تب و تاب تک نہیں آیا हमारे इश्क़ से कैसे मिले जनूं को फ़रोग़  हमारा इश्क़ तब_ओ_ताब तक नहीं आया  ابھی مشیت ِ خالق نہیں پڑھی تونے ؟ ابھی تو سورہ ء احزاب تک نہیں آیا अभी मशीयत_ए_ख़ालिक़ नहीं पढ़ी तु ने  अभी तु सुरह_ए_अहज़ाब तक नहीं आया وہ رنگ زنگ ہوا یا بنا دھواں آخر  جو رنگ اس لب ِ نایاب تک نہیں آیا वह रंग रंग हुआ या बना धुआँ आख़िर  जो रंग उस लब_ए_नायब तक नहीं आया بھرے ہیں مشکوں میں مشکیزگاں نے دریا تک  ہمارے ہاتھ میں تالاب تک نہیں آیا भरे हैँ मुश्कों मे मुश्केजगाँ ने दरया तक  हमारे हाथ मे तालाब तक नहीं आया ندی چڑھی ہے کئی بار میری آنکھوں کی  مگر یہ سلسلہ سیلاب تک نہیں آیا नदी चढ़ी है कई बार मेरी आँखों...

Ghazal_Poet_Ahmed Imtiaz

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जवाब एक सा है और सवाल एक सा है ये क्या हुआ है कि दोनो का हाल एक सा है  बुलंदियों का वहां है तो पस्तियों का यहां है  बस आसमा_ओ_ज़मीं का कमाल एक सा है हर एक शख्स का अंजाम रायगानी है ये ज़िंदगी है तो सब पे वबाल एक सा है जुदाई  आंख में आंसू हैं मिलना खंदा ब लब फ़िराक एक सा सबका विसाल एक सा है कोई भी साअत खुश रंग आज तक न मिली हमारे वास्ते हर एक साल एक सा है  अहमद इम्तियाज جواب ایک سا ہے اور سوال ایک سا ہے یہ کیا ہوا ہے کہ دونوں کا حال ایک سا ہے بلندیوں کا وہاں ہے تو پستیوں کا  یہاں  بس آسمان و زمیں کا کمال ایک سا ہے ہر ایک شخص کا انجام رائیگانی ہے یہ زندگی ہے تو سب پہ وبال ایک سا ہے جدائی آنکھ میں آنسو ہیں ملنا خندہ بہ لب فراق ایک سا سب کا وصال ایک سا ہے کوئی بھی ساعت خوش رنگ آج تک نہ ملی ہمارے واسطے ہر ایک سال ایک سا ہے احمد امتیاز

Ghazal_Poet_Sarwat Mukhtar

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दर्द तहरीर कर लिया जाए ग़म को तस्वीर कर लिया जाए करबला को अगर जरूरत हो खूं जिगर चीर कर लिया जाए दर्द छलके ना आंख से टपके मिसरा ए मीर कर लिया जाए खुद को कैदी अगर बनाना हो तुमको ज़ंजीर कर लिया जाए झुटे ख़्वाबों का एक ताज महल फिर से तामीर कर लिया जाए भर के सरवत मिठास लहजे में बात को तीर कर लिया जाए सरवत मुख्तार درد تحریر کر لیا جائے  غم کو تصویر کر لیا جائے  کربلا کو اگر ضرورت ہو  خوں ، جگر چیر کر لیا جائے  درد چھلکے نا آنکھ سے ٹپکے  مصرع۔ میر کر لیا جائے  خود کو قیدی اگر بنانا ہو. تم کو زنجیر کر لیا جائے  جھوٹے خوابوں کا ایک تاج محل. پھر سے تعمیر کر لیا جائے؟  بھر کے ثروت مٹھاس لہجے میں. بات کو تیر کر لیا جائے  ثروت مختار

Ghazal _Poet Syed Ali shahrukh

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चमन मिले भी तो सेहरा शुमार होते हैं यह हादसात यहां बार-बार होते हैं यह आरजूं है उन बस्तियों में जा निकलूं कि अहले जर्फ़ जहां बेशुमार होते हैं वह जितनी देर में कश्ती क़रीब लाते  हैं हम इतनी देर में दरिया के पार होते हैं हमारे साथ मोहब्बत न कर दिलासा दे हम ऐसे लोग ग़रीबे दयार होते हैं विसाल व हिज़्र  को यकजा करेंगे हम कैसे यह दो किनारे कहां हम कनार होते हैं ना आप हौसला देते हैं रोने वालों को ना आप शामिले चीख़ो पुकार  होते हैं अजीब रंगे वफा है हमारी महफ़िल में हमारे यार ज़माने के यार होते हैं हम अपने दर्द तो तहरीर कर नहीं सकते तुम्हारे जि़क्र पर बस शर्मसार होते हैं सैयद अली शाहरुख چمن ملیں بھی تو صحرا شمار ہوتے ہیں یہ حادثات یہاں بار بار ہوتے ہیں  یہ آرزو ہے کہ ان بستیوں میں جا نکلوں  کہ اہل ظرف جہاں بے شمار ہوتے ہیں  وہ جتنی دیر میں کشتی قریب لاتے ہیں  ہم اتنی دیر میں دریا کے پار ہوتے ہیں  ہمارے ساتھ محبت نہ کر دلاسہ دے ہم ایسے لوگ غریب دیار ہوتے ہیں  وصال و ہجر کو یکجا کریں گے ہم کیسے یہ دو کنارے کہاں ہم کنار ہوتے ہیں  نہ آپ ح...

Ghazal _Poet _ Atta Ur Rehman Qazi

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Ghazal _ Shakh der shakh शाख़ दर‌ शाख़ कोई जख़्म सजाने की सेवा काम ही क्या है तेरा हिज्र मनाने की सिवा पूछते क्या हो चीराग़ो से हवा का नाता याद कुछ हो भी तो बुझते चले जाने कि सिवा और भी शाम कोई, शामे जुदाई से अलग और भी काम कोई, बोझ उठाने के सिवा हम के थे अक्से गरिज़ां के गिरफ्तार सो‌ हम खुद से मिलते भी कहां ,आएना ख़ाने कि सिवा वह तो यूं है कि अता पासे जुनूं था वरना काम कुछ और भी  थे ख़ाक उड़ाने के सिवा अता उर हमान क़ाज़ी شاخ در شاخ کوئی زخم سجانے کے سوا کام ہی کیا ہے تیرا ہجر منانے کے سوا پوچھتے کیا ہو چراغوں سے ہوا کا ناتا یاد کچھ ہو بھی تو بجھتے چلے جانے کے سوا اور بھی شام کوئی, شام_ جدائی سے الگ اور بھی کام کوئی، بوجھ اٹھانے کے سوا ہم کہ تھے عکس_ گریزاں کے گرفتار  سو ہم خود سے ملتے بھی کہاں آئینہ خانے کے سوا وہ تو یوں ہے کہ عطا پاس_ جنوں تھا ورنہ کام کچھ اور بھی  تھے خاک اڑانےکے سوا عطاء الرحمٰن قاضی

Ghazal .Poet _ Faqeeh Haider

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हवा के सामने हर फूल से लिपटना है बिखरता जिस्म हूं मुझको यूं ही सिमटना है  कोई सितारा कोई चांद चाहिए तो बता तेरे फकीर ने कश़कोल को उलटना है मैं तेरा हिज्र लिए सांस ले रहा हूं मगर ये वक़्त लगता नहीं यार मुझसे कटना है हमारे पेट ख़ुदा भर रहा है मिस्रों से हमारे हक़ में हमेशा यह रिज्क  बटना है ज़मीन राख लगे और आसमान धुआं न जाने कैसे कहां कब ये खौफ छटना है ये सरहदों में मुक़य्यद मोहब्बतें कब तक गुले "लहोर" हूं मैं तू "हवाए" पटना है हमारे बाज़ू कटेंगे अलम संभालते वक़्त हमारी मशको ने दरिया किनारे फटना है अधूरे ख़्वाब में गुंजाइश ए वफ़ा क्या हो तुझे पढ़ा के मुझे जाने कितना घटना है हर एक चीज की होती है बाज़गश्त फ़कीह वह जा रहा है अगर तो उसे पलटना है फ़कीह हैदर     ہوا کے سامنــے ہر پھـــول سے لپٹنا ہے   بکــھرتا جســـم ہوں مجھ کو یونہی سمٹنا ہے  کوئـــی ستارہ کوئـــی چاند چاہیـــے تو بتا ترے فقیر نے کشـــکول کو الٹنا ہے   میں تیرا ہجر لیے سانس لے رہا ہوں مگر  یہ وقت لگتا نہـــیں یار مجھ سے کٹنا ہے   ہمارے پیٹ خـــدا بھـــر رہا ہے ...