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Ghazal_Poet_Bushra Bhakhtiar Khan

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उदास लोगों के साथ रहना पड़ा कभी तो पता चलेगा कभी हुई जो बुझी निगाहों से दोस्ती तो पता चलेगा पता चलेगा कि कौन किस से भला कहां तक है प्यार करता हर एक अजी़यत अकेली जां पर अगर सही तो पता चलेगा हमें पता ही नहीं कि कैसे यह लोग खुश बाश रह रहे हैं कभी कहीं जो मिली हमें भी कोई ख़ुशी तो पता चलेगा मैं अपने प्यारों पे जान छिड़कूं हर एक क़दम पर निभाऊं रिश्ते कभी जो महसूस होगी उनको मेरी कमी तो पता चलेगा यूं तपते सेहरा में जान देना, युं घर लुटाना, यूं ज़ुल्म सहना अगर करें कोई इस तरह से जो बंदगी तो पता चलेगा बुशरा बख़्तियार ख़ान اداس لوگوں کے ساتھ رہنا پڑا کبھی تو پتہ چلے گا  کبھی ہوئی جو بجھی نگاہوں سے دوستی تو پتہ چلے گا پتہ چلے گا کہ کون کس سے بھلا کہاں تک ہے پیار کرتا ہر اک اذیّت اکیلی جاں پر اگر سہی تو پتہ چلے گا ہمیں پتہ ہی نہیں کہ کیسے یہ لوگ خوش باش رہ رہے ہیں کبھی کہیں جو ملی ہمیں بھی کوئی خوشی تو پتہ چلے گا میں اپنےپیاروں پہ جان چھڑکوں،ہراک قدم پرنبھاؤں رشتے کبھی جو محسوس ہو گی ان کو ...

Sher_Poet_ Ubaid Saqib

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जब वह नहीं रहा तो बहारें नहीं रहीं सुखे रहे शजर तो परिंदे भी उड़ गए उबैद साकिब جب وہ نہیں رہا تو بہاریں نہیں رہیں سوکھے رہے شجر تو پرندے بھی اڑ گئے عبید ثاقب

Sher_Poet_Abdur Rehman Wasif

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उधेड़ दी है मेरी रूह तक इसी ग़म ने तुझे बिछड़ के मेरी याद तक नहीं आई अब्दुर रहमान वासिफ़ اُدھیڑ دی ہے مِری رُوح تک اِسی غم نے      تُجھے بچھڑ کے مِری یاد تَک نہیں آئی         ۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔                      عَبدَالرَّحمٰن وَاصِف

Ghazal_Poet _Zulfiqar Zaki

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हिसाब ए दिल में जो उल्फ़त के गोशवारे हैं क़सम ख़ुदा की वह जितने भी हैं तुम्हारे हैं है और बात कि हम ग़ौर ही नहीं करते वगरना विस्ल में भी हिज्र के इशारे है कई बरस कई सदियां असीर हैं इन में यह चंद पल जो तेरी याद में गुजा़रे हैं कि जैसे से उलझी हुई डोरियां संवर जाऐं किसी दुआ ने मेरे बख्त़  यूं संवारे हैं हवा के दोश पे राकिब ،ग़ुसैल मौजों का वह तनतना है के  सहमे हुए किनारे हैं ख़मोश बैठ के तकता हूं रोज़ हैरत से दरूने जा़त भी क्या-क्या हसीं नज़ारे हैं मेरे कलाम का उनुवान बस मोहब्बत है हर एक शेर में चाहत के इस्तेआरे रहे हैं कोई दुआ या कोई विर्द हो ज़की जैसे शबे फ़िराक़ ,मैंने अश्क यूं शुमारे हैं ज़ुल्फ़िका़र ज़की حسابِ دل میں جو الفت کے گوشوارے ہیں قسم خدا کی وہ جتنے بھی ہیں تمھارے ہیں ہے اور بات کہ ہم غور ہی نہیں کرتے وگرنہ وصل میں بھی ہجر کے اشارے ہیں کئی برس ،، کئی صدیاں اسیر ہیں ان میں یہ چند پل جو تری یاد میں گزارے ہیں کہ جیسے الجھی ہوئی ڈوریاں سنور جائیں کسی دعا نے مرے بخت یوں سنوارے ہیں ہوا کے دوش پہ راکب ، غصیل موجوں کا وہ طنطنہ ہے کہ سہمے ہوئے کنارے ہیں خموش بیٹ...

Sher_Poet_Syed Ali Sharukh

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हम अपने दर्द तो तहरीर कर नहीं सकते  तुम्हारे ज़िक्र पे बस शर्मसार होते हैं सैयद अली शाहरुख़ बुखा़री ھم اپنے درد تو تحریر کر نہیں سکتے تمہارے ذکر پہ بس شرمسار ہوتے ہیں س ع ش بخاری

Ghazal_Poet_Syed ‎Javed Bukhari

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तमाम आग तखै़युल  में भर के ला रहा था  मैं एक दर्द से सुबकदोष होके आ रहा था क़दीम याद  अजब दर्द लेके आई थी पुराना जख़्म नई शोलगी  दिखा रहा था इसी लिए तो मेरा चेहरा गर्द गर्द हुआ  मैं आईने की नज़र में गु़बार ला रहा था आंख बुझते हुए भी बुझा रही थी यह प्यास हाथ जलते हुए भी दीया जला रहा था यहअब ग़ज़ल में दर आए हैं और भी पहलू गए दिनों में मोहब्बत ही का़फि़या रहा था  वह ख़ुद को चाक पे लाया था लेकिन उससे अलग वह अपनी ख़ाक से रोशन दिया बना रहा था धुआं धुआं सी मोहब्बत कहां गई जावेद उससे बुझती हुई रोशनी कमा रहा था सय्यद जावेद تمام آگ تخیل میں بھر کے لا رہا تھا میں ایک در سے سبک دوش ہوکے آرہا تھا قدیم یاد عجب درد لے کے آئی تھی پرانا زخم نئی شعلگی دکھا رہا تھا اسی لئیے تو مرا چہرہ گرد گرد ہوا میں آئینے کی نظر میں غبار لا رہا تھا وہ آنکھ بجھتے ہوئے بھی بجھا رہی تھی یہ پیاس وہ ہاتھ جلتے ہوئے بھی دیا جلا رہا تھا یہ اب غزل میں در آئے ہیں اور بھی پہلو گئے دنوں میں محبت ہی قافیہ رہا تھا وہ خود کو چاک پہ لایا تھا لیکن اس سے الگ وہ اپنی خاک سے روشن دیا بن...

Sher _Poet_Sadia Jameel

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शब दरीचे में आन बैठी है  अपनी आंखें चिराग़् कर दो ना सादिया जमील شب دریچے میں آن بیٹھی ہے اپنی آنکھیں  چراغ  کردو ناں سعدیہ جمیل